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बुद्ध-पूर्णिमा के अलावा भी बुद्धत्व को प्राप्त हों

बुद्ध ईश्वर नहीं हैं, विष्णु के अवतार नहीं हैं… महामानव भी नहीं हैं। बुद्ध बस एक पहेली बन कर रह गए हैं। बुद्ध जीसस और साईं बाबा की तरह चमत्कारी नहीं हैं, वो न ईश्वर हैं और न ईश्वर की संतान। ईश्वर की सत्ता और स्वर्ग-नरक के प्रपंच को उन्होंने नहीं माना। वो किसी की मनौती पूरी नहीं करते, ब्राह्मणों के लिए वो वन्दनीय भी नहीं हैं, झूठ-मूठ के घोषित अवतार किसी हिन्दू मन्दिर में विराजमान नहीं हैं। उनके नाम पर व्रत नहीं रखे जाते, कोई धूमधाम से उनका जन्मदिन भी नहीं मनाता, बुद्ध के हिन्दुस्तानी अनुयायी दंगे-फसाद नहीं करते लेकिन बुद्ध के गैर-भारतीय अनुयायी वो सब करते हैं जिसके लिए बुद्ध ने मना किया था।
बुद्ध के अनुयायी भारत से कैसे विलुप्त हो गए और अन्य देशों में कैसे फले-फूले ये चर्चा का विषय हो सकता है… सम्राट अशोक के द्वारा फैलाये गए बौद्ध भिक्षुओं ने कई देशों में बौद्ध-धर्म का प्रचार-प्रसार किया। इतिहासकारों ने बहुत ही लचर और दिग्भ्रमित तर्क दिया कि बौद्ध मठों में भिक्षुणियों के प्रवेश से बौद्धमार्गी पतित हो गये और बौद्ध धर्म विलुप्त हो गया, ये बात गले नहीं उतरती… इससे भी बड़ी गप्प ये बनाई गयी कि सिद्धार्थ ने युवावस्था तक रोगी, वृद्ध और मृतक नहीं देखे थे… ये अत्यंत हास्यास्पद गप्प है जिसको इसलिए प्रचारित किया गया कि बौद्ध धर्म और पालि भाषा के लोप और बौद्ध विहारों का हिन्दू ताकतों द्वारा दमन की बर्बर दास्ताँ को हमेशा के लिए दबाया जा सके।
जयदेव ने गीतगोविन्द के दशावतारम में ये श्लोक लिखा है-
“निन्दसि यज्ञविधेरहह श्रुतिजातम् ।
सद्यहृदयदर्शितपशुघातम् ।।
केशव धृतबुद्धशरीर जय जगदीश हरे ।।१३।।
“O Kesava (Vishnu) ! In the form of Buddha, the enlightened one! Out of compassion in your heart you have condemned the ritualistic fraction of the Vedas proclaiming the killing of innocent animals.”
बुद्ध के विचार और शाकाहार का जीवन-दर्शन हिन्दुओं द्वारा अपनाया जा चुका है, कमाल की बात ये है कि शाकाहार को बुद्ध से पहले ही जैनी तीर्थंकरों ने बढ़ावा दिया था और पशु-बलि को निषिद्ध किया। अग्नि और सूर्य को पूजने वाले सनातनी धर्मी मूर्ति-पूजक बन गए, यज्ञों में बलि का प्रचलन तो पूर्ण रूप से बंद हो गया लेकिन अभी भी पश्चिम बंगाल, असम और हिमाचल-प्रदेश के मंदिरों में पशुबलि यथावत चालू है।
जगन्नाथ पुरी जो कि हिंदुओं के चार प्रमुख धाम में से एक है, कभी बौद्ध मठ हुआ करता था, आखिर हिंदुओं ने शंकराचार्य के निर्देशन में बौद्ध-धर्म का दमन क्यूँ किया और कैसे किया इस बारे में आप स्वयं ही खोजबीन करें। बुद्ध के बारे में आपको इन्टरनेट कोई प्रमाणिक जानकारी नहीं देगा, बौद्धग्रन्थ हों या हिन्दूओं के प्राचीन ग्रन्थ, ये सर्व-सुलभ नहीं है… और जो प्राप्य हैं भी उनकी टीकाओं ने मूल लेख का सत्यानाश कर रखा है इसलिए बुद्ध को जानने के लिए भी तप करना पड़ेगा। रोटी-रोजी से फुर्सत मिले तो कभी बौद्ध-दर्शन को भी खंगाल सकते हैं। सबसे अच्छी बात ये है कि बुद्ध दुनिया को बदलने की बात नहीं करते वो जीवन की पवित्रता बनाए रखने को ही धर्म बताते हैं, संघ का दर्शन बौद्ध धर्म के पहले न था, संगठित धर्म में अब ईसाई और इस्लाम का नाम लिया जाता है लेकिन संघ पर इतना जोर देना ये इंगित करता है कि निर्वाण प्राप्ति के लिए अकेले नहीं बल्कि सबको साथ में रख कर जीवन के असली ध्येय को प्राप्त किया जाये।
बुद्धम शरणम् गच्छामि
संघ शरणम् गच्छामि
धम्मम शरणम् गच्छामि
© सुशील कुमार
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4 thoughts on “बुद्ध-पूर्णिमा के अलावा भी बुद्धत्व को प्राप्त हों

  1. Thank you very much sirji🙂

  2. Buddha saranam gachami

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