Sushil Kumar's Blog

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ऊधो, मोहिं ब्रज बिसरत नाहीं (उद्धव् मुझे ब्रज भुलाये नहीं भूलता)

जब कभी किचन का समान घटता है तो यूँ लगता है कि दौड़ कर जाऊँ निशातगंज की मार्केट या इंदिरानगर की बजरंगी की दुकान और सारा समान ले आऊँ… लेकिन ये क्या निशातगंज और इंदिरानगर दिल्ली में थोड़े न हैं वो तो लखनऊ में हैं। लखनऊ में बिताये दिनों की यादें और साक्षात् लखनऊ दिमाग से निकलता ही नहीं है, शायद दिल्ली के किराये के मकान में रहने वाले शख्स के दिमाग में लखनऊ घर बना चुका है। दिल्ली में क्यूँ रह रहा हूँ? और कब तक रहूँगा ये प्रश्न मुझे खाए जाता है… दिल्ली मुझे बेगानी लगती है, दिल्ली में ग्यारह साल बिताने के बाद भी ये कभी अपना शहर नहीं लगा… दिल्ली में रहना और दिल्ली को कोसना अब आदत बन चुकी है। अपनी जड़ों को तलाशने में मैं नाकाम हो रहा हूँ, लोग दिल्ली में क्यूँ बसना चाहते हैं मेरी समझ से बाहर की बात है। मैं अपना शहर किसे कहूँ जहाँ जन्म लिया (कानपुर), जहाँ शैशव अवस्था गुजरी (लोकतक, मणिपुर), जहाँ बचपन कटा (इलाहाबाद), जहाँ जवानी गुजरी (लखनऊ) या फिर जहाँ जवान से अधेड़ होने वाले हैं (दिल्ली)।
कोई दिल्ली में क्यूँ रहना चाहता है? कहीं दूर झारखण्ड, छत्तीसगढ़, कर्णाटक, केरल या अंदमान निकोबार में क्यूँ नहीं… लेह, लद्दाक, मिजोरम, सिक्किम में क्यूँ नहीं बसना चाहता कोई, आखिर क्या देती है दिल्ली… रोज़गार? वो तो यहाँ नाम-मात्र है… यहाँ पढ़े-लिखे लोगों से ज्यादा अंगूठाछाप पैसे कमाते हैं।
लखनऊ में मैंने केवल पाँच साल गुजारे हैं जो जीवन के सबसे ठलुआ दिन थे, उन दिनों ने सपनों को रोज़ टूटते, कुचलते और रौंदते देखा है फिर भी इस शहर से मोहभंग नहीं होता है, ये कोई अध्यात्मिक नगरी नहीं है, देश का चुनिन्दा पर्यटन स्थली भी नहीं है… यहाँ बहने वाली गोमती नदी पूजनीय नहीं है और न पापनाशिनी है लेकिन फिर भी है कुछ इस शहर में जो अन्य कहीं नहीं है।
देश के अट्ठारह राज्य और तीन केन्द्र-शासित प्रदेश को देख चुकने के बाद जितना अपनापन लखनऊ से लगा उतना और किसी शहर से नहीं।
लखनऊ शहर ने कुछ दिया नहीं और दिल्ली ने कुछ बिगाड़ा नहीं फिर भी दिल्ली शहर के प्रति नफ़रत मिटाए नहीं मिट रही है। मेरे लिए लखनऊ ही ब्रज है जैसे ‘स्टॉकहोम सिंड्रोम’ से ग्रस्त व्यक्ति को अपने उत्पीड़क से विशेष लगाव हो जाता है। ऊधो, मोहिं ब्रज बिसरत नाहीं।
(इक्कीस मई २००१ को दिल्ली में पहली बार आने और यहाँ के दलदल में समा जाने पर भाव उद्गार हैं ये।)

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5 thoughts on “ऊधो, मोहिं ब्रज बिसरत नाहीं (उद्धव् मुझे ब्रज भुलाये नहीं भूलता)

  1. Memories and imagination is always more comforting than reality.

  2. दिल्ली के बारे में हमारे विचार भी कुछ ऐसे ही हैं , पता नहीं क्यों हमें दिल्ली विदेश जैसे लगता है … हमें मुंबई में ऐसा अनुभव नहीं हुआ , कोलकोता शहर भी बहुत अच्छा लगा … हैदरआबाद के तो हम बाशिंदे रह चुके हैं…

  3. दिल्ली की आपाधापी, यहाँ की ज़ुबान, यहाँ वर्क-कल्चर, यहाँ के लोग… यहाँ की हवा… यहाँ के पानी… सबसे दिक्कत होती है मुझे

    • MAHADEVA S SARMA on said:

      Similarly I had just visited Kolkota only on official journeys but I have loved the friendly atmosphere there…

  4. Abhay on said:

    I was in Lucknow for only 2 weeks. But felt attached with this city. This is the most lovable North Indian city for me after Patna.

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