Sushil Kumar's Blog

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धरम का मर्म न जाने कोय

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रोजाना हजारों तीर्थालु ब्रज की पवित्र भूमि के दर्शन और गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा लगाने जाते हैं लेकिन इनमे से आपको एक भी ऐसा श्रद्धालु नहीं मिलेगा जो अपने मित्र के चरण पखारने को तैयार होवे जैसे कृष्ण ने सुदामा के चरण धोये थे, कोई शबरी के झूठे फल भी नहीं खा सकेगा क्यूँकि इससे इनकी आत्मा, शरीर, धर्म और तपस्या मलिन हो जाएगी। ये श्रद्धालु नहीं हैं, ये धर्म के लिए कटने-मरने-मारने वाले उद्विग्न भक्तगण हैं जो मन्दिर में भगवान खोजते हैं, ब्रज की धूल को माथे पर लगाते हैं, यमुना का सड़ा हुआ काला दूषित जल का आचमन करते हैं, सब धर्म के नाम पर! इन्होने कभी रहीम-रसखान-मीरा को नहीं पढ़ा है। मैं यूँ ही अंट-शंट नहीं बक रहा हूँ, आज शुक्रवार या जुमा का दिन है और दो हफ्ते पहले जुमे के ही दिन हिन्दुओं के धाम में हिन्दू-मुस्लिम दंगा हुआ था, गाँव के गाँव जला दिए गये, तलवार से सब्जी-फेरी वाले काट दिए गये, मरने वालों और घायलों की संख्या बताना बेवकूफी वाला काम होगा, क्यूँकि दंगों में केवल लोग ही नहीं मरते हैं, मरती है हमारी सांझी विरासत और इंसानियत। दंगों का कारण बहुत ही तुच्छ था, निर्जला एकादशी को हिन्दू धर्मार्थी शरबत बाँट रहे थे, तपती दोपहरी में शरबत बाँटना पुण्य का काम है, जुमे की नमाज अदा करके मुसलमानों का हुजूम आया तो उनको भी शरबत पिलाया गया, एक उन्मादी ने शरबत के ड्रम में हाथ धो दिया, कहा सुनी हुयी और मुस्लिम बहुसंख्यक (उस क्षेत्र के हिसाब से) आये और मार-काट शुरू कर दिए, गाँव के गाँव आग के हवाले कर दिए गये, बैंको को भी नहीं छोड़ा गया, यूपी की सरकार ही जब तुष्टिकरण करती हो तो फिर – सैयां भये कोतवाल अब डर काहे का!
आखिर मस्जिद के वजू के जल को पाक समझने वाला, पाँच वक़्त नमाजी शरबत के जल को क्यूँ नापाक करता है, क्या एक आदमी सारे समुदाय का प्रतिनिधित्व करता है? क्या ऐसी घटनाओं से हिन्दुओं में मुसलमानों के लिए नफ़रत और गहरी नहीं हो जाती? शरबत के कुछ लीटर जल क्या इंसानों के जीवन से ज्यादा मूल्यवान हैं? क्या गोधरा में मुस्लिम बुजुर्ग चाय बेचने वाले की दाढ़ी खींचने और मुस्लिम महिला सफाई कर्मचारी से छेड़छाड़ की वजह से ट्रेन की बोगी नहीं फूंकी गयी थी? चन्द मुट्ठी भर लोगों के कुकृत्य से क्या सारा देश नहीं झुलसता है? अगर इन लोगों को इतना ही गुस्सा आता है तो फौज में क्यूँ नहीं चले जाते जहाँ इनकी उर्जा का सदुपयोग हो सके, भारत में दंगो का सबब गीता-कुरान के फटे पन्ने, सुअर या गाये का मांस होता है, अभी भी पंजाब के एक जिले में गौ-मांस की वजह से कर्फ्यू लगा हुआ है। क्या गीता-कुरान के फटे पन्नों से आहत लोग कभी इन धर्मग्रंथों को पढ़े भी हैं?
मेरे हिसाब से शरबत के पानी को अपवित्र करना कोई इतनी बड़ी घटना नहीं थी कि इसपर बवाल खड़ा किया जाता, पिछले साल मेरी सेवा इस्कॉन मन्दिर के किचन में लगी थी जहाँ पाँच हज़ार लोगों का प्रसाद बन रहा था, भीड़ कम होने के बाद मन्दिर का ही एक सफाई कर्मचारी नशे में धुत आ कर खीर के भगोने में ही गन्दे हाथ ड़ाल कर खीर खाने लगा, मैंने उसे वहाँ से हटा कर अलग से खीर खाने को दे दिया, अगर मैं गुस्सा होता तो उसको एक-आध चपत भी लगा सकता था या फिर उस ग़रीब की नौकरी भी जा सकती थी, लेकिन मैंने ऐसा कुछ नहीं किया क्यूँकि मैं कट्टर भक्त नहीं हूँ। आखिर क्रोध से क्रोध और बैर से बैर को नहीं जीता जा सकता है। अब आप समझ सकते हैं कि बेकार की बातों से देश में दंगे क्यूँ होते हैं और एक-दूसरे के धर्म को नफ़रत से क्यूँ देखा जाता है।
हर मुसलमान कसाई नहीं होता और हर हिन्दू शाकाहारी नहीं होता है। मन्दिर-मस्जिद में ज्यादा वक़्त गुजारने वाले ही दंगा-फसाद रचते हैं, कहीं तुम्हारा ईश्वर/अल्लाह झूठा तो नहीं जो तुमको सही रास्ता न दिखा सके और दंगा करने को भड़काए?
कुछ लोग भक्ति के लिए साधू-वेश धारण कर लेते हैं लेकिन इनके अन्दर ईश्वर के प्रति न प्रेम होता है और न ही भक्ति –
“माथै तिलक हाथ जप माला, जग ठगने कू स्वांग बनाया।
मारग छांड़ि कुमारग डहकैं, सांची प्रीत बिनु राम न पाया।।”
© सुशील कुमार

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6 thoughts on “धरम का मर्म न जाने कोय

  1. Moti Lal on said:

    सबसे सुन्दर लाईन……. आपके लेख की….. हर मुसलमान कसाई नहीं होता और हर हिन्दू शाकाहारी नहीं होता है। मन्दिर-मस्जिद में ज्यादा वक़्त गुजारने वाले ही दंगा-फसाद रचते हैं, कहीं तुम्हारा ईश्वर/अल्लाह झूठा तो नहीं जो तुमको सही रास्ता न दिखा सके और दंगा करने को भड़काए?

  2. MAHADEVA S SARMA on said:

    आपका का यह लेख हमें बहुत अच्छा लगा | धर्मान्धता मनुष्य को किस तरह राक्षस बना देती है , सोचने वाला मानव जब धर्मं के दायरे में ही रह कर सोचने लगता है तो, कभी कभी हैवान हो जाता है | यह कैसी विडम्बना है ? धर्मं चाहिए इसलिए कि आदमी को मनुष्यत्व से देवत्व की ओर ले चलने, लेकिन सच्चाई यह है – जो आपने लिखा – वही देखनो को मिलता है..आपने मंदिर में जो किया उस से मैं सहमत हूँ | आदमी में बदलाव लाना ज़रूरी है | हाँ, जब लोग हद पार कर जाते हैं , और बार-बार कहने या समझाए जाने पर भी न समझें तो फिर लाठी किस काम का?

    • नर सेवा ही नारायण सेवा है, यही हमारे धार्मिक ग्रन्थ सिखाते हैं

    • जिस घटना का मैंने जिक्र किया था उसमे गंदे हाथ से खीर का पात्र झूठा करने वाला शराब का नशेड़ी नहीं है, शराबियों को तो मन्दिर में प्रवेश ही नहीं है और इतनी महंगाई में गरीब इसको अफोर्ड भी नहीं कर सकता, हाँ लेकिन नशे के अन्य उपाय भाँग की गोली है… अब जो नशे में हो उसके लिए क्या सही और क्या गलत?

  3. dharam ka maram aaj marham hai kewal dharam ke thekedaro ke liye, nirih ashay bhakat aaj v kewal sewa dharam may vissssshwasssssssssh rakhte hai
    ha aaj v kuch bhakat kewal do char ache pakwan khane ya fir chori chupe prasad ghar lane ke liye jate hai,
    aaj kitne hi mandiro ke bhakat ko main janta hu jo dersan karne tak nahi jate, unhe to kewal….mahprasade govinda…. ka intjar rahta hai,
    ha kuch ease v hai jo prasad khane ke bad darsan karte hai,
    kuch kewal darsan karne ya sewa karne jate hai,
    rahi bat sabri ke ber ya kam kapdo ke kanyayo ki,,,, to kuch ghatiya post google mahraj pe uplabdh hai, aese log waha jaye enjoye kare,dharam ko ganda na kare,,
    sab yehi kehte hai,,, sai itna dije aangan kuti samay, main v bhuka na rahu koi sadhu na bhuka jaye,
    magar kuch log ,,, sai itna dije ghar nahi mahal banaye,
    main to bhukha na rahu,hsazro bhukha mar jaye..
    rahi murti pooja ka virodh karne walo ki….
    mano to bhagwan, na mano to pashan,
    aur aapke manne ya na manne se koi khas farak nahi padta, maga aaha hai ki apke ghar main apke mata pita apse sahmat nahi honge,
    ab aap kabir ka nam loge,,,, pathar pooje hari mile, to main pooju pahar, ta se to chakki mile, pis kjaye sansar,
    to mera jawab hoga jarur,aap chakki ke tarah sewa kare, logo ko bhojan dene ki koisis kare,
    nar sewa hi to narayan sewa hai,
    aaj kal peta ki … per sewa v narayan sewa hai,
    ok tata hari hari ,sabba khair,
    asudhiyo ya asahmatiyo ke liye mafi chahuhnga

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