Sushil Kumar's Blog

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The Happy Prince

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दोस्तों बहुत समय पहले की बात है जब ऑस्कर वाईल्ड जैसे कथाकार अमर कहानियाँ रचते थे। सवा सौ बरस बीतने पर भी ये कहानियाँ समकालीन लगती हैं। ऑस्कर वाईल्ड की ‘द हैपी प्रिंस’ कहानी को इतना सराहा गया है कि इसकी तारीफ में शब्द फीके पड़ जाते हैं। ये कहानी है एक मृत राजकुमार की सुन्दर मूर्ति की जिसमें उस राजकुमार की आत्मा वास करती है। स्कूल के बच्चे और नगर के मेयर उस स्वर्णजड़ित मूर्ति की प्रशंसा किये न थकते थे। मूर्ति के हाथ में एक तलवार होती है जिसके मूढ़ में बेशकीमती माणिक जड़ा होता है और मूर्ति की आँखों में भारत से मँगाई गई विशेष नीलम मणि लगी हुयी होती है।

उस राजकुमार ने अपने जीवन में कभी भी असली ख़ुशी को अनुभूत नहीं किया था लेकिन उसकी हँसती-मुस्कुराती मूर्ति सबको बहुत लुभाती थी। शान-शौक़त में पले बढ़े राजकुमार ने कभी ये जानने की परवाह नहीं की थी कि महल की दीवार पार जो बस्ती है, जो उसका राज्य है, वहाँ लोग कैसे जीवन गुजर बसर करते हैं। राजकुमार के लिए मौज-मज़ा ही ख़ुशी का पर्याय था। लेकिन एक दिन राजकुमार की मृत्यु हो जाती है और उसके दरबारी राजकुमार की मूर्ति शहर के सबसे ऊँची जगह लगा देते हैं। इस जगह से राजकुमार को आमजनों की कष्टमयी ज़िन्दगी, ग़रीबी और शहर की कुरूपता नज़र आती है और पहले दिन से ही मृत राजकुमार की आत्मा रोती रहती है लेकिन उसके आँसूओं को कोई नहीं देख पाता है।
सामाजिक विषमता, शासकवर्ग द्वारा मौजमस्ती के जीवन की निरर्थकता और रात को खाली पेट सो रहे दो बच्चे जो सर्दी से बचने के लिए एक दूसरे से लिपट कर सड़क किनारे सो रहे हैं और चौकीदार द्वारा दुत्कार के भगा दिए जाते हैं। बीमार बच्चे की माँ जो राजकुमारी के लिए सुंदर पोशाक सी रही होती है और जिसका बच्चा ज्वर में तड़प रहा होता है और सिर्फ एक संतरा खाने की जिद करता है।
एक रात मिश्र की ओर रवाना ‘स्वालो पक्षी’ रात गुजारने को सोने से मढ़ी मूर्ती के पैरों के बीच रुकता है, वो अपनी किस्मत पर इतराता है कि आज उसे सोने के लिए स्वर्णमयी शयनगार मिला है, लेकिन उसका आनंद क्षणिक होता है क्यूँकि कहीं से पानी की बड़ी सी बूँद उसको भीगो देती है, वह पक्षी यूरोप के बेमिजाज़ मौसम को कोसता है क्यूँकि कहीं भी दूर तक उसको बारिश के बादल नहीं दिखते, आसमान बिलकुल साफ़ होने पर भी उसको पानी गिरना आश्चर्य चकित कर देता है। तभी दूसरी बूँद गिरती है और वह कहता है कि सोने की मूर्ति का क्या लाभ जो बारिश से न बचा सके, वह उधर से उड़ कर एक सुरक्षित चिमनी की खोज में उड़ने को पंख फड़फड़ाने वाला ही होता है तभी वो तीसरी बूँद से भीग जाता है और उसकी नज़र मूर्ति के सोने के मुखड़े से टपकते आँसूओं पर अटकती है, चाँदनी रात में मूर्ति के दमकते चेहरे को देख पक्षी का ह्रदय द्रवित हो जाता है।
पक्षी पूछता है – ‘तुम कौन हो?’
‘मैं ख़ुशमिजाज़ राजकुमार हूँ’
‘फिर तुम क्यूँ रो रहे है? क्या तुम्हे मालूम भी है कि तुम मुझे कितना भिगो चुके हो?’
‘जब मैं ज़िन्दा था तब मुझे मालूम भी न था कि आँसू क्या होते हैं, हमारे महल में दुःख को प्रवेश करने की इज़ाज़त भी न थी, मुझे दरबारी ख़ुशमिजाज़ राजकुमार बुलाते थे और आनंद ही मेरे लिए ख़ुशी थी, मैं यूँ ही आनंदमग्न जीता रहा और ऐसे ही मर गया, और अब मरने के बाद मुझे पता चला कि मेरी प्रजा कितनी दुखी है, लोगों की कठिनाई भरी ज़िन्दगी देख कर मेरे पास रोने के सिवाय कोई और चारा नहीं बचा है।
राजकुमार पक्षी को बोलता है कि मिश्र जाने से पहले वो तलवार से कीमती माणिक को उस बूढ़ी औरत को सौंप दे जिसका बच्चा बीमार है, और पक्षी ये काम ख़ुशी-ख़ुशी कर देता है फिर राजकुमार एक नाटककार की मदद करने को कहता है लेकिन उसके तलवार के अलावा और कोई मणि बची नहीं होती है, वह पक्षी से कहता है कि तुम मेरी एक आँख से नीलम निकाल कर उस नाटककार को दे दो फिर तुम चाहे तो मिश्र की ओर चले जाना, पक्षी दुखी मन से मूर्ति की रत्नजड़ित आँख को चोंच से निकाल कर नाटककार के कमरे में गिरा आता है, इसी बीच पक्षी और राजकुमार में दोस्ती और प्रगाढ़ हो जाती है, पक्षी मूर्ति से ये कहता है कि यहाँ मौसम ठंडा होता जा रहा है और उसे मिश्र के गर्म मौसम की आस है नहीं तो इतनी बढ़ती ठण्ड में उसका जीना दूभर हो जायेगा।
वो मूर्ति को अलविदा कहने जाता है तो राजकुमार कहता है कि एक ग़रीब लड़की की माचिस गटर में गिर के ख़राब हो गयी है, अगर उसने घर पर माचिस न पहुँचाई तो उसकी पिटाई होगी और इन सबसे बचने के लिए तुम मेरी दूसरी आँख की नीलम उस बच्ची को दे आओ। पक्षी कहता है ये मैं नहीं कर सकता वरना तुम अँधे हो जाओगे, राजकुमार कहता है ये मेरा आदेश है और तुम्हे मानना ही पड़ेगा। पक्षी नीलम दे कर वापस आता है तो राजकुमार चैन की साँस लेता है और कहता है कि अब तुम मिश्र जा सकते हो, पक्षी बोलता है नहीं अब तुम अँधे हो चुके हो और मैं तुम्हे छोड़ कर कहीं नहीं जाने वाला।
पक्षी शहर के चक्कर लगाता और राजकुमार को उसकी प्रजा का हाल सुनाता। लोगों की ग़रीबी को दूर करने के लिए मूर्ति ने अपनी सोने की चादर को धीरे-धीरे प्रजा में बाँट दिया और बढ़ती ठण्ड से एक दिन पक्षी की मौत हो जाती है। मूर्ति के पैरों में पड़ी पक्षी की लाश और बेनूर और भद्दी हो चुकी मूर्ति को नगर के मेयर और कौंसिलर देखते हैं और ये फरमान सुनाते हैं कि अब किसी पक्षी को इस तरह से यहाँ मरने की इज़ाज़त नहीं दी जाएगी। भट्ठी में मूर्ति को पिघलाने का एकमत से निर्णय लिया जाता है, लेकिन बाद में सभी कौंसिलर आपस में झगड़ बैठते हैं कि नई मूर्ति उन्ही की बनेगी। भट्ठी में मज़दूर देखते हैं कि मूर्ति का ह्रदय पिघलता नहीं है क्यूँकि वो सीसा का बना हुआ होता है, उस ह्रदय को कूड़ेदान में फेंक दिया जाता है, जहाँ पक्षी का मृत शरीर पड़ा होता है। ईश्वर फ़रिश्ते को शहर से सबसे कीमती दो चीज़ लाने को भेजता है। फ़रिश्ता मरे हुए पक्षी और सीसे के ह्रदय को ईश्वर को सौंपता है जिसे ईश्वर स्वीकार करके कहता है कि तुम्हारी पसंद उचित है, अब ये पक्षी मेरे स्वर्ग के बगीचे में गायेगा और ये ख़ुशमिजाज़ राजकुमार मेरी सोने की नगरी में मेरी स्तुति करेगा।
दोस्तों ये तो त्याग, समर्पण और मित्रता की अनमोल कहानी थी लेकिन आज भी हमारे ग़रीब मुल्क में ऐसे सनकी शासक आते हैं जो जनता की गाढ़ी कमाई से अपनी मूर्तियाँ बनवाते हैं, कुछ उन्हें तोड़ते हैं, ये मूर्तियाँ जनता के पैसों से बार-बार बनायीं जाएँगी लेकिन इन पत्थरदिल मूर्तियों में सीसे का ह्रदय नहीं मिलेगा और न ईश्वर के स्वर्ग में कोई स्थान।

© सुशील कुमार

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7 thoughts on “The Happy Prince

  1. Stories are just that: stories.

  2. naveen saini on said:

    It is almost true respected sir but we are poor people like the old lady who was swing suit for the Rajkumari. No one is here to see our wounds
    Some where it is a hard truth

  3. Nagendra on said:

    good story and thought

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