Sushil Kumar's Blog

straight from my heart and soul

थोड़ी सी गाय हो जाये!

दुनिया में सिर्फ़ हिन्दू और इस्लाम ही दो ऐसे धर्म हैं या कहा जाये ‘कट्टर’ धर्म हैं जो मांस-सेवन को लेकर अति सजग हैं। मुसलमान के लिये सुअर का नाम सुनना भी कुफ्र है और यही बात हिन्दूओं के उपर लागू होती है जो गाय का मांस सुनकर ही भड़क जाते हैं। कुछ दिनों से फेसबुक पर गौ-मांस को लेकर चल रही कवायद काफ़ी कटु रूप धारण कर चुकी है। गाय के बूचड़खानों का दृश्य, या मुसलमानों द्वारा गो-हत्या के प्रचार कि यही हैं गाय के हत्यारे लेकिन यथार्त में ऐसा है नहीं। कम पढ़ा-लिखा, औसत या अधिक पढ़ा-लिखा हिन्दू ये सुनने को भी तैयार नहीं होता कि वो जिन देवताओं की पूजा-अर्चना करते हैं, व्रत रखते हैं, और जिनकी याद में शाकाहार के कसीदे पढ़े जाते हैं दरअसल वो देवता और अवतारी भगवान रामायण, महाभारत के मूल ग्रन्थ में मांसाहारी और शराबी हैं।

ये सब मैं इसलिए लिख रहा हूँ क्यूँकि फेसबुक पर वैष्णव-पंथियों की नई जमात ने आज-कल गौ-सेवा का ठेका उठा रखा है, और भोली-भाली जनता को बरगला रहे हैं। इनके मन्दिर में अध्-पढ़े लिखे नीम-हकीम ख़तरे में जान मार्का स्वयं-भू, धर्म-उपदेशक अनर्गल प्रलाप और हास्यास्पद प्रवचन करते हैं। जैसे कि वेदों में लिखा है कि गाय पालने का अधिकार सिर्फ़ ब्राहमण को है, कृष्ण के पास ग्यारह लाख गाये थीं, इत्यादि। लेकिन ये धर्म के ठेकेदार न तो मन्दिर में गाय पालते हैं और न मन्दिर की फ़र्श को गाय के गोबर से लीपते हैं।

गाय एक हथियार बन गया है, अपनी सर्वोच्चता दिखाने का और इतिहास झूठलाने का। महाभारत और ऋग्वेद जहाँ गौ-मांस भक्षण के वृत्तांतों से भरे हुए हैं और ब्राह्मणों के द्वारा अतिथि सत्कार का अतिउत्तम भोजन गौ-मांस बताते हैं वहीं हिन्दू धर्म के आधुनिक संतान गौ-मूत्र के जी भर पेटेंट करने को अमादा हैं। एक तथाकथित धार्मिक संस्थान के स्वामी द्वारा रचित पुस्तक ‘साइंस टू सेल्फ रियालाईजेशन’ में गौ-मांस को खाना निषिद्ध बताया गया है और भैंस, बकरी का मांस खाना स्वीकार्य किया गया है! कारण ये बताया गया है कि ‘गाय माँ है और दूध देती है!’ तो मेरा ये प्रश्न है कि क्या भैंस और बकरी लेमन-सोड़ा देती है?

औसतन हिन्दू को बकरा, मुर्गा खाने से कोई परहेज़ नहीं है। अधिकांशतः परिवार में दिन की शुरुआत ही आमलेट से होती है तथा मंगलवार और साल के दो नवरात्रों में कसाई मक्खी मारते पाए जाते हैं। मैंने भी खूब मांसाहार किया है, ये प्रोटीन का उत्तम स्रोत है, अब आठ वर्ष से गैर-मांसाहार हूँ। चूँकि शाकाहार जैसा इस दुनिया में कुछ नहीं है इसलिए इस पारिभाषिक शब्द से बच रहा हूँ, आप फलाहारी तो हो सकते हैं लेकिन शुद्ध शाकाहारी नहीं, गेँहू में पिसा घुन सब खाते हैं, दूध या चाय सब पीते हैं। और दूध खेत में नहीं होता है और न पेड़ पर उगता है। ये शुद्ध पशु-उत्पाद है जिसे चाव से सभी सेवन करते हैं। एक बात तो बताना ही भूल गया कि मांसाहार करना मैंने ब्राह्मण मित्रों से ही लखनऊ में सीखा था जो कंठी-माला उतार कर मांस-सेवन करते थे। ऐसे धर्म की सदा ही जय होनी चाहिए!

वैसे आप जब हरे लेबल का लगा हुआ आईस-क्रीम खायें तो ये ज़रूर याद रखें कि दूध को आईस-क्रीम में जमाने का तत्व जिलेटिन होता है जो आईस-क्रीम बनाने में एक आवश्यक संघटक है और गाय की हड्डी से ही प्राप्त होता है।

गौ-प्रेम में रचा बसा औसतन हिन्दू कभी ये स्वीकार नहीं करेगा कि ब्राह्मणों, ऋषि-मुनियों द्वारा यज्ञ और रोज़मर्रा के भोजन में इस्तेमाल गाय और गौ-वध के कारण ही जैन धर्म और बौद्ध धर्म बना और बाद में अपने अनुयायियों की घटती तादाद के कारणवश हिन्दूओं को शाकाहार अपनाना पड़ा।

ख़ैर हिंदी के मूर्धन्य लेखक श्रीलाल शुक्ल अपनी कहानी राग-दरबारी में एक जगह लिखते हैं कि आदमी भी कैसा प्राणी है, न इसका गू इंधन के काम आता है न खाल किसी काम की। कितनी सच बात है।
है न?

© सुशील कुमार

कहने को गौ-माता लेकिन कचरा खाती गाय, भारत में आम दृश्य

कहने को गौ-माता लेकिन कचरा खाती गाय, भारत में आम दृश्य

हिन्दू धर्म की 'माता' कचरा खाती हुई

हिन्दू धर्म की ‘माता’ कचरा खाती हुई

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31 thoughts on “थोड़ी सी गाय हो जाये!

    • आपने जिस किताब का जिक्र किया है, मैं ऐसी किताबें पढ़ने का शौक़ नहीं पालता, आप मूल महाभारत, रामायण और ऋग्वेद पढ़ें, हमारे पूजनीय देवता/भगवान राम, श्याम, शिव सभी शिकार/आखेट करते थे और माँसाहारी थे…
      आजकल टीवी में महादेव सिरिअल आ रहा है जिसमे प्रजापति दक्ष के यज्ञ का बड़ा वर्णन था… महाभारत में भी इस यज्ञ का जिक्र है और इस यज्ञ में अश्व-मेध (horse sacrifice) होना था… और सभी आमंत्रित देवी-देवताओं, ब्राह्मणों के लिए तरह-तरह के माँस के पकवान बने थे जिसको शिव के गणपतियों ने डकार लिया और अतिथियों के लिए छोड़ा तक नहीं…
      अब टीवी पर असलियत दिखा कर हिन्दू धर्म को नंगा तो होना नहीं है!

      • “The propriety or otherwise of meat eating has been raised several times. Meat was a favourite item of food for the Ksatriyas and it appears that the Brahmins in the ancient times ate meat and beef too.
        Vyasa’s Mahabharatam by Bharadvaja Sarma, page no. 15.”
        iskee alawa bhi sari Mahabharata hunting ke bare me hai…

      • When we refuse to listen (read) argument, preposition becomes a religion. According to Anirudh, scriptures are doctored.
        Vegetarianism is essentially a way of life which will involve least violence. Now what some people were doing at any time or whether scriptures were doctored or not; is an academic debate. It does not help as to how to live our life. Such debates lead to fanaticism. Debate over the fact as to what was past always remain ambiguous. As regards, hypocrisy in religious practices, it not a news but a fact of life. organised religion has to be hypocrite because it refuses debate. Eat whatever you like, but make sure that you smell right otherwise people will shun you.

      • Sir ji staunch Hindus are too critical for two issues – first is Aryan invasion and second is Cow-meat eating. Without reading original text of Mahabharata and Rigveda a person must not poke his nose just for the sake of debate.
        Anirudh has not read Mahabharata, his only source of knowledge to Mahabharata is B. R. Chopra’s serial and that serial was too much doctored!

      • When I have original text of Mahabharata and Rigveda which suggests cow-sacrifice and cow-meat eating then why should I read 19th, 20th or twenty first century books written by fanatic Hindus whose only goal is to glorify Hindu dharma.

      • @Sushil…..aap sirf woh kitabe padhna pasand karte hain, shayad, jo aapko political discussion ka mileage de…in other words u like to read what u like to think…and vice versa

  1. gau mansh khane ki koi pukhta praman nahi hai prabhu, ha! mans bhakchan treta yug aur satyug may tha , ye to manta hu
    aur jis tarah ke gau sewa ke nam pe dharmik bhawnaoo ko bharkaya ja raha hai usse main bahut chintit hu
    subh ratri

    • Dukh ye hai ki apko tooti-footi English ati hai aur Sanskrit tooti-footi bhi nahi. Gaye agar khate the Arya to isko sweekar karne me itni takleef kyun hoti hai logo ko. Rigveda aur Mahabharat mein dher sare shloka hain Gau-maans bhakshan ke. Isme hairani ki baat kya hai?

      • sanskrit hamari kaesi hai isme apnko tippani ki jarurat nahi
        apki sanskrit aur hindi sath may eng bahut achi hai
        bhagwan apko aur adhik sikchit aur gyani banaye , ye hamari prarthna hai prabhuji
        aap tarrakki kare ham to itne may hi santust hai
        subh ratri

      • Aap agle Sunday jab milenge to English, Hindi ya Sanskrit jis bhasha mein bhi padhna chahenge wo apko padhwa denge ki Mahabharat & Ramayana mein Gau-maans bhakshan hota tha ya nahi.

  2. Forget cow. How you managed to get photographs of so many beautiful girls on your sidebar?

  3. Sandeep Ji…the matter is not about whether meat eating and/ or cow meat eating is good in faith and a part of the right way of life OR not, but it is essentially about whether Aryan System and Brahmans in those days approved cow slaughter and meat eating as a part of day to day eating habbit, and rituals or not..which inturn is questioning the ethos of Hindu religion. The problem is while Sushil is questioning the books I referred to, I am questioning the scripts he referred to….so as a matter of fact the fundamental base of discussion/ debate has not been established.

    Religious practices are always subject to changes with the course of time as many practices are forsaken and many others included, after lot of thinking, debate and consensus amongst the think tank of any period on spiritual or philosophical accounts..thus giving rise to sects and new religions. So it may not be right to question the improvisation adopted which is nothing but the new ‘avatar’ of the same religion. After all what a religion and a culture adopts in a course of time is also manifested as the richness of the same.

    • Anirudh Babu; Things seen by eyes can also be wrong. What is the point of discussion over something like this. This reminds me of Kalidas and the mute debate he had entered with his wife. Debate was called Shastrartha. Problem is we want to debate anything and everything. A debate is useful only if it helps us to live off our life better. Eating drinking are all matters of habits. I have written about it many times. For example smoking. See http://wp.me/p10RwS-sW.
      As regards Religion, my view is that if we stir the dirt we will get dirty. World could have been a better off place without religion. See http://wp.me/p10RwS-GQ.
      I agree with the possibility of doctoring of scriptures. I have read many versions of Bhagwat Geeta and since I know a little hindi I can understand that sanskrit word could not have meant that. So different versions of have different interpretation. Now if Hindu Gods can be transported into Gregorian/Christian Calender, anything can happen. (About Calender see here: http://wp.me/p10RwS-E4)

  4. Anirudh why don’t you read Rigveda and Mahabharata.
    There is a famous saying Res ipsa loquitur means the story speaks about itself.
    And why Hindus have become so hypocrite that they enjoy chicken, mutton, fish, etc. but get over-sensational over cow-meat?

    • Yaa yaa u r right Sushil …infact by your principle why should people become over sensational (hyper) about human eating human being (Cannibalism)….if insects, chicken, snake, goat, dog, fish, egg, buffalo, elephant, camel, shark, whale and cow can be eaten up why not a human being be killed for human fondness for meat eating..food for your thought..!!!

      • Mr. Bhatjiwale, you must know that there was custom of Human sacrifice or Nara-medha in Mahabharata era. If you want to eat mother-cow then you may eat, if you don’t eat then please don’t persuade others to not eat it.

      • Sita’s prayer to river Ganga to offer liqour and rice laced with meat if she and Rama comes back safely after fourteen years of Vanvasa
        http://www.valmikiramayan.net/ayodhya/sarga52/ayodhya_52_frame.htm
        suraaghaTasahasreNa maamsabhuutodanena cha |
        yakshye tvaam prayataa devi puriim punarupaagataa || 2-52-89
        89. devii= “Oh, goddess! Upaagata= After reaching; puriim= the city (Ayodhya); punaH= again; yakshhye= I shall worship (you); suraaghata sahasreNa= with thousand pots of spirituous liquor; maamsa bhuutodanena cha = and jellied meat with cooked rice; prayataa= well-prepared for the solemn rite.”
        “Oh, goddess! After reaching back the city of Ayodhya, I shall worship you with thousand pots of spirituous liquor and jellied meat with cooked rice well prepared for the solemn rite.”

  5. वाल्मीकि रामायण, अरण्य काण्ड, रावणाधिक्षेप अध्याय, सैंतालिसवां सर्ग, सीता-रावण (ब्राहमण वेश में) संवाद, श्लोक २२-२३ –
    हे ब्राहमणोत्तं! हम इस गंभीर वन में अपने ओज के सहारे विचरण करते हैं, आप थोड़ी देर विश्राम कीजिये, यदि संभव हो तो यहाँ निवास कीजिये, मेरे पति रुरु हरिण, गोह, वराह आदि जंगली पशुओं को मार कर एवं उनका मांस ले कर आएंगे
    samaashvasa muhuurtam tu shakyam vastum iha tvayaa || 3-47-22
    aagamiSyati me bhartaa vanyam aadaaya puSkalam |
    ruruun godhaan varaahaan ca hatvaa aadaaya amiSaan bahu || 3-47-23
    22b, 23. muhuurtam samaashvasa= for a moment, be comfortable; tvayaa iha vastum shakyam= by you, here, to take rest, possible; me bhartaa= my, husband; ruruun= stag with black stripes; godhaan= mongooses like [civet-like mammals of the family Viverridae, esp. of the genus Herpestes, Marathi manguus]; varaahaan ca= wild-boars, also; hatvaa= on killing; bahu amiSaan aadaaya= aplenty, meat, on taking; puSkalam vanyam aadaaya= plentiful, forest produce, on taking; aagamiSyati= will be coming [soon.]
    “Be comfortable for a moment, here it is possible for you to make a sojourn, and soon my husband will be coming on taking plentiful forest produce, and on killing stags, mongooses, wild boars he fetches meat, aplenty. [3-47-22b, 23]
    http://www.valmikiramayan.net/aranya/sarga47/aranya_47_frame.htm

  6. Mohit Joshi on said:

    Hi Sushil!

    Please throw some more light on How and When Hindus started thinking against cow slaughter.What triggered this and how it got so deeply ingrained. By what ever you have quoted I believe there must be some strong and well spread literature against cow slaughter also which helped in building anti-cow slaughter sentiments in Hindus.

    Mohit

    • Hi Mohit!
      It’s nice to see your comment. Actually your question is valid and answer lies in the food-habit of Vedic Aryans. Eating any kind of animal meat was not a taboo. Cow, bull, ox and horse were common animals which were sacrified in Yagyas. Strict vegetarianism among Hindus started after the advent of Jainism and Buddhism and after the fiddling of Sanatani followers, same yagyas and rituals took form of idol-worshiping and pure-vegetarianism.
      Just look how horse sacrifice yagya in Valimiki Ramayana was turned as a simple yagya in Tulsidasa’s Ram Charit Manas with only Kheer as prasadam.
      देखिये तुलसीदास की रामचरित मानस संतानोंपत्ति यज्ञ के बारे में क्या कहती है –
      बालकाण्ड, सृंगी रिषिहि बसिष्ठ बोलावा । पुत्रकाम सुभ जग्य करावा ।।
      भगति सहित मुनि आहुति दीन्हें । प्रगटे अगिनी चरु कर लीन्हें ।।

      जो बसिष्ठ कछु हृदयं बिचारा । सकल काजु भा सिद्ध तुम्हारा ।
      यह हबि बाँटि देहु नृप जाई । जथा जोग जेहि भा
      ग बनाई ।
      तब अदृस्य भाए पावक सकल सभहि समुझाई ।
      परमानंद मगन नृप हरष न हृदयं समाई ।।१८९।।
      तबहिं रायं प्रिय नारि बोलाईं । कौसाल्यादि तहाँ चलि आईं ।।
      अर्ध भाग कौसल्यहि दीन्हा । उभय भाग आधे कर कीन्हा ।।

      अब देखिये मूल रामायण अर्थात वाल्मीकि रामायण इस अश्वमेध यज्ञ के बारे में क्या कहती है और घोड़ा कैसे खीर में बदल जाता है –
      कौशल्या ने उस घोड़े की सभी प्रकार से पूजा कर के परम प्रसन्नता से तीन बार तलवार चला कर उस का वध किया । कौशल्या धर्मलाभ की कामना से मन शांत कर के उस घोड़े के साथ एक रात रहीं । (श्लोक ३३-३४)
      होता, अध्वर्यु एवं उद्गाता ने अपने हाथ से दशरथ की अन्य क्षत्रिय जाति वाली रानियों, वैश्य जाति की पत्नियों एवं शुद्र जाति की स्त्रियों से उस घोड़े का अंगस्पर्श कराया । इन्द्रियों पर संयम रखने वाले ऋत्विजों ने उस घोड़े की चर्बी को ले कर शास्त्रीय विधि से पकाया । राजा दशरथ ने अपने पापों का विनाश करते हुए शास्त्रीय विधि एवं परंपरा के अनुसार उस चर्बी के धुएं की गंध को सूंघा । (श्लोक ३५-३७)

  7. This debate forced me to dwell deeper and my synthesised thoughts on the subject are here. http://sandeepbhalla.com/2012/09/10/lost-history-and-meaning-of-vegetarianism-in-hinduism-and-in-west/ Enlighten me.

    • Thanks for dragging me to this debate. By personal experience I could say that vegetarianism or strict vegetarianism is very dangerous thing. I have many close friends and relatives who are strict vegetarian but die-hard drunkard. If such food habit compels one to another drinking habit then it is really a dangerous habit indeed for both body and soul.😀

  8. थोड़ी सी गाय हो जाये की तर्ज पर थोड़ी सी गंगा हो जाये! हिन्दू समाज में बहुत हिपोक्रेसी है – गाय मारे मारे फिरती पॉलीथीन खाती है। बूढ़ी हो जाने पर लोग रेल से कटने छोड़ देते हैं। उसी तरह गंगा नदी को नाला बनाये दे रहे हैं।

    • हिन्दुओं ने जिस किसी को भी माँ का दर्ज़ा दिया है उसका बंटाधार कर दिया है चाहे गंगा नदी हो या फिर गाय!

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