Sushil Kumar's Blog

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बर्फ़ी – एक मूक प्रेम गाथा

 
एक सफल कहानी वही होती है जो हमसे बातें करती है और जिसके सुख-दुःख को हम अपना मान बैठते हैं, कमोबेश यही मानक एक सफल फिल्म के साथ भी तय होते हैं।
किसी शारीरिक अक्षम इंसान को सहानुभूति या हँसी का पात्र न बना कर एक ऐसे किरदार को रचना जो हमारे बीच का हो बहुत बड़ी बात है। फिल्म निर्देशक अनुराग बासु स्वयं भी एक्युट ल्युकीमिया से उबर चुके हैं शायद इसीलिए फिल्म में कई दर्दभरे दृश्य उन्होंने सहजता से फिल्माएं हैं।
ये फिल्म कई प्रश्न खड़े करती है। इंसान की पूर्णता आख़िर क्या है? उसकी शारीरिक पूर्णता या फिर करियर में सफलता और ढ़ेर सारा पैसा? क्या जीवन में सब कुछ बटोर कर भी इंसान सारी खुशियाँ समेट लेता है या सब कुछ हासिल करने के बावज़ूद भी वो अपूर्णता को ढ़ोता रहता है?
जो तथाकथित रूप से नॉर्मल हैं वो भी बीमारी के दौरान क्या ख़ुद को एब्नॉर्मल नहीं पाते? क्या एब्नॉर्मल होना नॉर्मल है या फिर नॉर्मल होना एक प्रकार की एब्नॉर्मिलिटी है?
ये मेरी पहली फिल्म समीक्षा है, इसलिए सुधिजन किसी त्रुटी के लिए माफ़ करें, फिल्म समझने और जानने के लिए कई बार देखना पड़ा।
इंटरमिशन तक हम ये जान पाते हैं कि मर्फ़ी उर्फ़ बर्फ़ी के पैदा होते ही उसकी माँ का स्वर्गवास हो जाता है, ग़रीब ड्राईवर पिता मर्फ़ी को लाड़ से पालता है और वहीँ रईस परिवार में जन्मी ऑटिज़्म (आत्मविमोह) से पीड़ित झिलमिल (प्रियंका चोपड़ा) की शराबी माँ उसको बचपन में मार डालने की कोशिश करती है और उसको मुस्कान जैसी संस्था में पालने को छोड़ देती है। आर्थिक विषमता और संसाधनों की कमी और बहुतायत का सामाजिक ताने-बाने से अलग होना शायद राज कपूर के उस गीत को इंगित करता है “दुनिया वही, दुनियावाले वही… कोई क्या जाने किसका जहां लूट गया”।
बर्फ़ी का पहला प्रेम श्रुति घोष (इलियाना डी’क्रूज़) हैं जो इस फिल्म की सूत्रधार भी है। श्रुति के प्यार में मदहोश होने पर उसकी प्रेक्टिकल माँ (रूपा गांगुली) उसे व्यावहारिकता का पाठ पढ़ाती है कि उसे भी कॉलेज के दिनों में एक ग़रीब से प्यार हुआ था और जो आज भी लकडहारा है।
एक स्टार रणबीर कपूर सायकिल चलाते हुए एक स्टार ही नज़र आते हैं लेकिन वो किसी पत्र के सामने आते ही मूक-बधिर बन कर अपने किरदार में इस तरह समां जाते हैं कि फिर वहाँ किसी रणबीर कपूर की गुंजाईश नहीं बचती, वहाँ हम सिर्फ बर्फ़ी से जुडाव महसूस करते हैं, शायद यही एक कुशल कथानक और निर्देशन की जीत है।

कहानी हमें सत्तर के दौर में ले जाती है जब इश्क फेसबुक से शुरू हो कर कोर्ट में ख़तम नहीं होता था। ज़िन्दगी स्लो थी और प्यार के विकल्प भी कम थे, कहानी के अंत में श्रुति द्वारा अपनी माँ से पूछना कि क्या आज भी वो अपने पहले प्यार को भुला नहीं पाई है? शायद इसी बात को दर्शाता है।
फिल्म में मुख्य पात्र के तौर पर दार्जिलिंग भी है जो कहानी का हिस्सा बन जाता है, कोलकाता के हावड़ा ब्रिज से ज्यादा दार्जिलिंग की टॉय ट्रेन लुभाती है, सौरभ शुक्ला जो एक पुलिस इंस्पेक्टर का किरदार निभा रहे हैं, उनकी आधी ज़िन्दगी बर्फ़ी के पीछे भागने में ही गुज़र जाती है, टॉय ट्रेन की खिड़की से हाथ-रिक्शा में बैठे सौरभ शुक्ला का बर्फ़ी को पकड़ना बड़ा दिलचस्प दृश्य बन पड़ा है। फिल्म की पूरी कहानी सुनाना इस फिल्म के साथ ज्यादती होगी लेकिन ये फिल्म मनोरंजक है, पारिवारिक है, हल्के-फुल्के मज़ाक और रोमांस से फिल्म की कहानी आगे बढ़ती है। कहानी में कई जगह पेंच है और कई पात्र कथानक से फिसलते नज़र आने लगते हैं। फिर भी जैसी भी फिल्म बन पड़ी है वो गुलज़ार की कोशिश, संजय लीला भंसाली की ख़ामोशी दा म्यूज़िकल और ब्लैक से कहीं आगे निकल चुकी है।
ऐसी फिल्मों की व्यवसायिक सफलता से भी बड़ी सफलता ये रही है कि समाज से कटे, अलग-थलग शारीरिक एवं मानसिक अक्षम लोगों के प्रति नज़रिया बदल रहा है, अब सोच बदल रही है, जब भी तारे ज़मीन पर और बर्फ़ी जैसी सार्थक फिल्में बनेंगी इन फिल्मों को दर्शक भी मिलते रहेंगे।
नीलेश मिश्रा के बोल शायद कहानी भी दर्शाती है और ज़िन्दगी का फलसफा भी –
“क्यूँ न हम तुम
चले ज़िन्दगी के नशे में ही धुत सरफिरे
चल भटक ले न बाँवरे
क्यूँ न हम तुम
तलाशें बगीचों में फ़ुर्सत भरी छाँव रे
चल भटक ले न बाँवरे”
© सुशील कुमार

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2 thoughts on “बर्फ़ी – एक मूक प्रेम गाथा

  1. It’s a depressing fact that the movie Barfi! is copied from many Hollywood flicks.

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