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गाँधी जी!


देश गाँधी जी को गाली देता है। स्कूली बच्चे कोर्स के बापू से अगाध प्रेम करते हैं लेकिन बड़े होकर वे भी गाँधी जी को गालियाँ देते हैं। सारा देश ही गाँधी जी को गाली बकता है। गाँधी जी एक बलि का बकरा बन गए हैं जो हर मौके दर मौके काम आते हैं।
देश में मुसलमान बढ़ रहे हैं तो गाँधी जी जिम्मेदार कि उन्होंने मुसलमानों को पाकिस्तान जाने से क्यूँ रोका। सरदार पटेल को प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया तो गाँधी जी जिम्मेदार। देश का बंटवारा हुआ तो गाँधी जी जिम्मेदार। मोदी मुसलमानों का नरसंहार करवाए तो गाँधी जी जिम्मेदार कि गाँधी की भूमि रक्त-रंजित हो गई!

दलित अगर डा. अम्बेडकर की दो क़िताब पढ़ ले तो वो भी गाँधी जी को जी भर कर गालियाँ देता है बिना ये जाने समझे कि गाँधी जी ने ही एक दलित के द्वारा ही भारत के नए संविधान बनने का अनुमोदन किया था।

महँगाई बढ़ जाये तो भी आम जनता नोट पर छपे गाँधी बाबा को गालियाँ देने से नहीं चूकती। दलित राजनीति की कलंक रहीं मायावती ने भी गाँधी जी को ‘शैतान की औलाद’ बोल कर अपनी राजनीति चमकाई थी।

देश की सरकार भी दो अक्टूबर को ‘ढलुवा दिवस’ मना कर एक कर्मयोगी के जीवन-सन्देश को गालियाँ देती है। गाँधी जी की तस्वीर सजती है सरकारी दफ्तरों में, कोर्ट-कचहरी में, पुलिस थानों में; सरकारी खर्चे पर लेकिन कोई अपने घर पर गाँधी जी को दो बाई तीन फीट की जगह भी नहीं देता दीवार पर टंगने के लिए।

गाँधी बाबा पर्याय बना दिये गये हैं, एक मज़ाक और उपहास स्वरुप जनता बड़े आराम से कहती है कि ‘मजबूरी का नाम महात्मा गाँधी’! जनता समझदार है जो एक अक्टूबर को ही शराब की दुकान से अग्रिम बोतलें इकट्ठी कर लेती है ताकी २ अक्टूबर को बंद मधुशाला के सामने गाँधी जी को गालियाँ न देनी पड़ें।

लेकिन मैं जिस गाँधी जी को जानता हूँ वो इनमे से कोई भी नहीं है। आज के सुविधा-संपन्न युग में जब हम एक साधारण से नमस्कार या ‘हाय’ का ज़वाब भी सामने वाले से नहीं पाते तब ये यकीन करना भी मुश्किल होगा कि गाँधी जी भोर में उठते ही अपने प्रशंसकों को रोज़ चार से पाँच घंटे उनके पत्रों का ज़वाब लिखते थे। और सारी दुनिया से उनको पत्र आते थे भले ही लिफाफे के ऊपर सिर्फ गाँधी जी या बापू लिखा हो। पढ़ने में आया है कि भारत सरकार का विदेश मंत्रालय गाँधी जी के पत्रों को नीलामी में खरीद-खरीद के उकता चुका है और माली हालत से पस्त हो चुका है।

कितनी सच बात है कि विश्व के महानतम वैज्ञानिक आइन्सटीन ने गाँधी जी के बारे में कहा था कि आने वाली पीढ़ियाँ इस बात पर आश्चर्यचकित होंगी कि इस संसार में कभी हाड़-माँस में महात्मा गाँधी जैसा व्यक्ति भी था।

क्या हम गाँधी जी को मात्र गालियों से ही तौलेंगे या फिर कभी उनके जीवन-चरित को समझने और अपनाने की कोशिश करेंगे?

सारी दुनिया में प्राकृतिक संसाधनों की लूट-घसोट की बन्दरबांट करते क्या हमें नेता, अधिकारी और व्यवसायी नज़र नहीं आते जो जनता को सन्देश देते हैं कि हमारे खिलाफ कोई दुष्प्रचार करे तो कान में ऊँगली ड़ाल लेनी चाहिए, हमें भ्रष्टाचार करने दो और अपना मुँह बंद रखो और हमारे भ्रष्टाचार को तुम मत देखो।

कोई बात नहीं गाँधी बाबा, तुम हमारे लिए दो अक्टूबर के मोहताज नहीं हो, जब दिल करेगा तब आपको श्रद्धांजलि देंगे।

गाँधी जी का प्रिय भजन ‘वैष्णव जन तो तेने कहिये जे पीड पराई जाणे रे’ –

वैष्णव जन तो तेने कहिये जे पीड पराई जाणे रे,
पर दु:खे उपकार करे तोये मन अभिमान न आणे रे,
सकल लोकमां सहुने वंदे निंदा न करे केनी रे,
वाच काछ मन निश्चल राखे धन धन जननी तेनी रे,
समदृष्टि ने तृष्णा त्यागी, परस्त्री जेने मात रे,
जिह्वा थकी असत्य न बोले, परधन नव झाले हाथ रे,
मोह माया व्यापे नहि जेने, दृढ़ वैराग्य जेना मनमां रे,
रामनाम सुताली लागी, सकल तीरथ तेना तनमां रे,
वणलॊभी ने कपटरहित जे, काम क्रोध निवार्या रे,
भणे नरसैयॊ तेनु दरसन करतां, कुण एकोतेर तार्या रे।


छायाचित्र साभार: http://www.mkgandhi-sarvodaya.org

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7 thoughts on “गाँधी जी!

  1. satyavachan prabhuji,
    abhi teen din pehle america ke president ne syunkt rastra sangh me Gandhiji aur unke vicharo ko yad kiya tha, ham bhi yad karte hai magar apne matlab ke liya, dhanyawad

  2. great post…thnx for writing smthing meaningful

  3. गाँधीजी को गाली देते हैं चूंकि वे अपने विचारों से जीवंत हैं। No one kicks a dead dog!

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