Sushil Kumar's Blog

straight from my heart and soul

What’s in a name?


More than a decade back, I was enjoying good old days in Jamia Millia Islamia’s hostel. Ours was the smallest hostel in Jamia so we knew other inmates by name and by face within a couple of days. I got befriended to a boy named Ashok whom I noticed after few days that he was offering five times namaz a day piously, so out of curiosity I asked him one day that your name is Ashok, a Hindu name, and why you are offering namaz. He said his whole village converted to Islam. Then he kept quiet for a while. I didn’t asked a second question. All answers were floating in his eyes.
So the boy named Ashok belonged to a State Haryana where anarchism and law of the jungle rules. There was some cow slaughter and Vishwa Hindu Parishad’s henchmen set afire whole village in anger and retaliation, in the false name of saving holy cow-mata (mother cow). There is one fanatic named Acharya  Giriraj Kishore who said violently that we will chop down one thousand heads of Dalits (low caste Hindus) if a single cow is slaughtered. Although Vedic Aryans were fond of cow-meat eating and cow-slaughter in yagyas were usual practice but their progenies have metamorphosed from cow-meat eating to cow-urine drinking with passage of time.
I am writing all this because after a decade nothing much is changed in this unruly State Haryana, Dalit girls are gang-raped and same right-winged organizations are mum but even if a single conversion to Islam or Christianity took place then they would be more than happy to torch a number of villages. Such is the true picture of Haryana which surrounds national capital of India from three sides. The same Haryana whose talented girls outshone in Olympics have a different story which doesn’t shake the stone-hearted judiciary and bureaucracy to act promptly to punish the culprits.

There are thousands of Ashok who opted to accept Islam and offering namaz because their past Hindu god Ram is of no use to Dalits since Valmiki Ramayana depicts Ram, the most revered Hindu god chopping the head of Shambuka, a Shudra (outcaste) by his sword who was performing a penance. So, in Ramayana and Mahabharata it was forbidden for a Shudra to study, to acquire the knowledge of Vedas and to do penance. Anyhow, modern day Acharyas might set afire Dalit’s village or upper caste men may gang-rape Dalit girls and film it on mobile’s camera and distribute the mms in village as considering mandir’s prasad but no force of fanatics may refrain an Ashok for making his call to Allah, the almighty.
May there be more boys, named Ashok.
Amen!
© Sushil Kumar
Image credit for Jama Masjid pic: Peter Rivera, http://www.religiousindia.info

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8 thoughts on “What’s in a name?

  1. The images you paint are disturbing indeed and provocative. Although the Constitution of India guarantees safety against assault – law enforcement is lax and must be demanded by voters.
    Can you please provide links to the passages in the Ramayana and Mahabharata which sanction what you wrote.

    • Sushil Kumar on said:

      You may be surprised to know that Lokmanya Tilak who outcried Britishers by giving the slogan “Swaraj hamara janamsiddha adhikar hai” had given the diktats to his followers that if some shudra argue with a Brahmin then cut his tongue and if he shows finger in protest to a Brahmin then burn his hut.
      Such is the other unknown face of our great freedom fighters.

  2. Sir, the query you asked is answered in posting of the pic from Valmiki Ramayana’s Shambuka-Vadha Episode in Uttara-Kand, 76th Sarga.

  3. “मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको” – अदम गोंडवी

    आइए महसूस करिए ज़िन्दगी के ताप को
    मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको

    जिस गली में भुखमरी की यातना से ऊब कर
    मर गई फुलिया बिचारी कि कुएँ में डूब कर

    है सधी सिर पर बिनौली कंडियों की टोकरी
    आ रही है सामने से हरखुआ की छोकरी

    चल रही है छंद के आयाम को देती दिशा
    मैं इसे कहता हूं सरजूपार की मोनालिसा

    कैसी यह भयभीत है हिरनी-सी घबराई हुई
    लग रही जैसे कली बेला की कुम्हलाई हुई

    कल को यह वाचाल थी पर आज कैसी मौन है
    जानते हो इसकी ख़ामोशी का कारण कौन है

    थे यही सावन के दिन हरखू गया था हाट को
    सो रही बूढ़ी ओसारे में बिछाए खाट को

    डूबती सूरज की किरनें खेलती थीं रेत से
    घास का गट्ठर लिए वह आ रही थी खेत से

    आ रही थी वह चली खोई हुई जज्बात में
    क्या पता उसको कि कोई भेड़िया है घात में

    होनी से बेखबर कृष्ना बेख़बर राहों में थी
    मोड़ पर घूमी तो देखा अजनबी बाहों में थी

    चीख़ निकली भी तो होठों में ही घुट कर रह गई
    छटपटाई पहले फिर ढीली पड़ी फिर ढह गई

    दिन तो सरजू के कछारों में था कब का ढल गया
    वासना की आग में कौमार्य उसका जल गया

    और उस दिन ये हवेली हँस रही थी मौज़ में
    होश में आई तो कृष्ना थी पिता की गोद में

    जुड़ गई थी भीड़ जिसमें जोर था सैलाब था
    जो भी था अपनी सुनाने के लिए बेताब था

    बढ़ के मंगल ने कहा काका तू कैसे मौन है
    पूछ तो बेटी से आख़िर वो दरिंदा कौन है

    कोई हो संघर्ष से हम पाँव मोड़ेंगे नहीं
    कच्चा खा जाएँगे ज़िन्दा उनको छोडेंगे नहीं

    कैसे हो सकता है होनी कह के हम टाला करें
    और ये दुश्मन बहू-बेटी से मुँह काला करें

    बोला कृष्ना से बहन सो जा मेरे अनुरोध से
    बच नहीं सकता है वो पापी मेरे प्रतिशोध से

    पड़ गई इसकी भनक थी ठाकुरों के कान में
    वे इकट्ठे हो गए थे सरचंप के दालान में

    दृष्टि जिसकी है जमी भाले की लम्बी नोक पर
    देखिए सुखराज सिंग बोले हैं खैनी ठोंक कर

    क्या कहें सरपंच भाई क्या ज़माना आ गया
    कल तलक जो पाँव के नीचे था रुतबा पा गया

    कहती है सरकार कि आपस मिलजुल कर रहो
    सुअर के बच्चों को अब कोरी नहीं हरिजन कहो

    देखिए ना यह जो कृष्ना है चमारो के यहाँ
    पड़ गया है सीप का मोती गँवारों के यहाँ

    जैसे बरसाती नदी अल्हड़ नशे में चूर है
    हाथ न पुट्ठे पे रखने देती है मगरूर है

    भेजता भी है नहीं ससुराल इसको हरखुआ
    फिर कोई बाँहों में इसको भींच ले तो क्या हुआ

    आज सरजू पार अपने श्याम से टकरा गई
    जाने-अनजाने वो लज्जत ज़िंदगी की पा गई

    वो तो मंगल देखता था बात आगे बढ़ गई
    वरना वह मरदूद इन बातों को कहने से रही

    जानते हैं आप मंगल एक ही मक़्क़ार है
    हरखू उसकी शह पे थाने जाने को तैयार है

    कल सुबह गरदन अगर नपती है बेटे-बाप की
    गाँव की गलियों में क्या इज़्ज़त रहे्गी आपकी

    बात का लहजा था ऐसा ताव सबको आ गया
    हाथ मूँछों पर गए माहौल भी सन्ना गया था

    क्षणिक आवेश जिसमें हर युवा तैमूर था
    हाँ, मगर होनी को तो कुछ और ही मंजूर था

    रात जो आया न अब तूफ़ान वह पुर ज़ोर था
    भोर होते ही वहाँ का दृश्य बिलकुल और था

    सिर पे टोपी बेंत की लाठी संभाले हाथ में
    एक दर्जन थे सिपाही ठाकुरों के साथ में

    घेरकर बस्ती कहा हलके के थानेदार ने –
    “जिसका मंगल नाम हो वह व्यक्ति आए सामने”

    निकला मंगल झोपड़ी का पल्ला थोड़ा खोलकर
    एक सिपाही ने तभी लाठी चलाई दौड़ कर

    गिर पड़ा मंगल तो माथा बूट से टकरा गया
    सुन पड़ा फिर “माल वो चोरी का तूने क्या किया”

    “कैसी चोरी, माल कैसा” उसने जैसे ही कहा
    एक लाठी फिर पड़ी बस होश फिर जाता रहा

    होश खोकर वह पड़ा था झोपड़ी के द्वार पर
    ठाकुरों से फिर दरोगा ने कहा ललकार कर –

    “मेरा मुँह क्या देखते हो ! इसके मुँह में थूक दो
    आग लाओ और इसकी झोपड़ी भी फूँक दो”

    और फिर प्रतिशोध की आंधी वहाँ चलने लगी
    बेसहारा निर्बलों की झोपड़ी जलने लगी

    दुधमुँहा बच्चा व बुड्ढा जो वहाँ खेड़े में था
    वह अभागा दीन हिंसक भीड़ के घेरे में था

    घर को जलते देखकर वे होश को खोने लगे
    कुछ तो मन ही मन मगर कुछ जोर से रोने लगे

    “कह दो इन कुत्तों के पिल्लों से कि इतराएँ नहीं
    हुक्म जब तक मैं न दूँ कोई कहीं जाए नहीं”

    यह दरोगा जी थे मुँह से शब्द झरते फूल से
    आ रहे थे ठेलते लोगों को अपने रूल से

    फिर दहाड़े, “इनको डंडों से सुधारा जाएगा
    ठाकुरों से जो भी टकराया वो मारा जाएगा

    इक सिपाही ने कहा, “साइकिल किधर को मोड़ दें
    होश में आया नहीं मंगल कहो तो छोड़ दें”

    बोला थानेदार, “मुर्गे की तरह मत बांग दो
    होश में आया नहीं तो लाठियों पर टांग लो

    ये समझते हैं कि ठाकुर से उलझना खेल है
    ऐसे पाजी का ठिकाना घर नहीं है, जेल है”

    पूछते रहते हैं मुझसे लोग अकसर यह सवाल
    “कैसा है कहिए न सरजू पार की कृष्ना का हाल”

    उनकी उत्सुकता को शहरी नग्नता के ज्वार को
    सड़ रहे जनतंत्र के मक्कार पैरोकार को

    धर्म संस्कृति और नैतिकता के ठेकेदार को
    प्रांत के मंत्रीगणों को केंद्र की सरकार को

    मैं निमंत्रण दे रहा हूँ- आएँ मेरे गाँव में
    तट पे नदियों के घनी अमराइयों की छाँव में

    गाँव जिसमें आज पांचाली उघाड़ी जा रही
    या अहिंसा की जहाँ पर नथ उतारी जा रही

    हैं तरसते कितने ही मंगल लंगोटी के लिए
    बेचती है जिस्म कितनी कृष्ना रोटी के लिए !

  4. उदग्र धर्म – चाहे हिन्दू हो, या मुस्लिम या फिर दलित, अर्थहीन होता है।

    • Sushil Kumar on said:

      In the year 1994, there was Dauna kaand in Allahabad, where a Dalit woman was made to parade naked in the village. This was the first time when my teenage mind failed to understand atrocities on woman in the name of caste-violence. In every 6 month, there occurs at least one incident of gross violation of basic human rights, whether it is Gadchiroli (Maharashtra), Pratapgarh (U.P.) or Jhajjar (Haryana).
      And I am amazed by the sentiments of urban middle class who gets agitated by thrashing of young girls at pubs in Assam or Mangalore but they think it to be just okay if women of low caste are raped/gang raped or murdered.

  5. good job sir…..keep it up! religion has lost its meaning at the hand of few fanatics and extremist these people consider themselves as well as their respective religion as perfect although they are worst then adi manav!

  6. Thanks for reading and commenting.

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