Sushil Kumar's Blog

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मरा चमड़ा और जीवित धर्म

कुम्भ मेला के साधू

कुम्भ मेले में आसन जमाये साधू

मैंने इस साल प्रण किया था कि नवरात्र में देवी एवं देवी के भक्तों के बारे में कुछ अनाप-शनाप नहीं कहूँगा, लेकिन बचपन की एक जिज्ञाषा शांत हो गयी है। आखिर छोटे-छोटे शहरों के बड़े-बड़े देवी के मंदिरों और बड़े शहरों के छोटे-बड़े मंदिरों में भक्तों के चमड़े के वॉलेट, लेडीज पर्स और चमड़े की बेल्ट पर आपत्ति क्यूँ होती है, खासतौर पर साल के दो नवरात्रों में। इस चमड़ा-द्वेष को दिल्ली के अक्षरधाम मंदिर में भी देखा जा सकता है और देवियों के सिद्धपीठ की भला बात ही क्या करना।
खैर, श्रीमदभगवदगीता के अध्याय छह, श्लोक ११- १२ में लिखा है –
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः ।
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ।।
तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः ।
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये ।।

शुद्ध भूमि में, जिसके उपर क्रमशः कुशा, मृगछाला और वस्त्र बिछे हैं, जो न बहुत ऊँचा है और न बहुत नीचा, ऐसे अपने आसन को स्थिर स्थापन करके – ।।११।।
उस आसन पर बैठकर चित्त और इन्द्रियों की क्रियाओं को वश में रखते हुए मन को एकाग्र करके अंतःकरण की शुद्धि के लिए योग का अभ्यास करें – ।।१२।।
अब प्रश्न ये उठता है कि मरे हिरण की मृगछाला कहाँ से उपलब्ध होगी और क्या आज का नवीन-सनातन उग्र हिन्दू धर्म मरी मृगछाला पर बैठ कर ध्यान या तप अथवा जप करना पसंद करेगा?
वैष्णव-जन तो इस तप-शैली को शैव-समुदाय का बताएँगे लेकिन ये वचन तो साक्षात कृष्ण अर्जुन को गीता में बोल रहे हैं।
लेकिन अभी तक मुझे मेनका गाँधी की ओर से इन दो श्लोकों पर किसी आपत्ति के बारे में पता नहीं चला है। आखिर किस टाइप के हिरण की बात की जा रही है – ‘द वाइल्ड लाइफ (प्रोटेक्शन) एक्ट, 1972’ के शेड्यूल 1, पार्ट 1 में कई तरह के हिरणों का वर्णन है, जिनका शिकार अथवा आखेट करना वर्जित है, और आप तो जानते ही हैं कि चौदह साल से सलमान एंड कंपनी कैसे कोर्ट का चक्कर लगा रहे हैं, कुलमिलाकर हिरण का मसला तो अब ग़ैरकानूनी हो चुका है। लेकिन क्या ये सच बात नहीं है कि गीता में आसन जमाने का जो ढ़ंग बताया गया है उसमें मृगछाला की बात भी है, फिर साल के नौ और नौ – अट्ठारह दिन और कुछ कट्टर हिन्दू मंदिरों में साल भर मरे चमड़े से इतना नाक-भौं क्यूँ सिकोड़ा जाता है? आपके पास उत्तर अथवा किसी प्रकार की जिज्ञाषायें हों तो ज़रूर बताएं। अगली नवरात्रि में अभी काफी दिन शेष हैं।
© सुशील कुमार

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4 thoughts on “मरा चमड़ा और जीवित धर्म

  1. सुशील बाबु, आपने अत्यंत साधारण परन्तु गृहन प्रशं उठाया है! Religion और धर्म दोनों के कई मतलब है! अन्य धर्मो की तरह हिन्दू धर्म के बहुत से शाखाये है जो Logic और वजहों पर आधारित नहीं है, वरन बाजारवादी विचारधारा से प्रेरित है! USP ! प्रत्येक धर्म की दूकान कुछ विशेष दिखा कर प्रलोभित करने का प्रयास कर रही है! दुकाने विमान उड़ाने के manual की भांति सतस्थ धाराओं का अवपालन नहीं करती बल्कि जरूरत के मुताबिक अपनी विचारधारा तोड़ और मरोड़ के ग्राहक को लुभान्वित रखने का प्रयास करती हैं! आपको धर्म पर शोध करना हो तो ग्रंथो को भूल कर जीवन का विश्लेषण करे, धर्म अवश्य मिलेगा परन्तु यदि धर्म ग्रंथो का ही अध्यन करेंगे तो आपको धर्म के खंडहर ही मिलेंगे! हर नए मंदिर में पुराना धर्म एक बार और विखंडित होता है! यह प्रकिर्या अविरल एवं शाशवत है!

  2. vivek on said:

    dakshin bharat ke mandiron mein to patloon bhe utari jati he.. is sambandh mein granthon mein kya likha he sir jee..!

  3. kaisar imam on said:

    Lot of hypocracy has been inserted into hindu religion by alleged contractor of hindu religion. Real relgion as explained in Vedas are totally different and is very close to muslim religion. I have evidences as i spent some time on that.

  4. satendra Yadav on said:

    आप मुझे अपना शिष्य बना लीजिये गुरूजी, आपका लिखा पड़कर मेरे अन्दर की जिज्ञासा जग गयी है की आप मेरे गुरु बन जायं .

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