Sushil Kumar's Blog

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शहर में गायें

वृन्दावन की कुञ्ज गली में कचरा खाती गाय

वृन्दावन की कुञ्ज गली में कचरा खाती गाय

वे दुह ली जाती हैं भोर होते-होते
फिर ग्वाले उन्हें छोड़ देते हैं
वे भटकती हैं शहर में
भूखी और खाद्य अखाद्य न जानती हुईं
जूठन खोजने के लिए
जहाँ-तहाँ सँकरे और सामानों से अटे-पटे
बाज़ार में मुँह मारती हुईं

वे बेखटके घुस जाती हैं टूट चुके किवाड़ों वाले सार्वजनिक शौचालय में
थूथन आगे कर चबड़-चबड़ कर खा ही लेती हैं मल
सड़क पर आते-जाते वाहनों के बीच समूह में
व्यूह के भीतर से जैसे निकलती हैं वे
निःशंक विचरती हैं
डरती नहीं हैं अब वे वाहनों से
और न बिदकती हैं
हार्न के कर्कश कर्णविदारक रव से।

उद्यान में खिलते फूलों से भरे पौधों के बीच
या प्रशस्त राजमार्ग पर वे अचानक कर देती हैं गोबर के बड़े-बड़े पोथे
फिर अचानक ही दौड़ पड़ती हैं हंबा-हंबा के गूँजते स्वर के साथ
हाथ में डंडे लिए लड़के उन्हें पुकारते हैं जब।

आज के प्रश्नों के आगे दहल गई पहले की आस्थाओं की तरह
वे पीटी जाती हैं बाज़ारों में लाठियों के प्रहार से लगातार या पत्थरों की मार से
और कभी-कभी पूज भी ली जाती हैं कहीं-कहीं बची रह गई श्रद्धा की तरह
अपमान और पूजा के बीच छीजती हैं गायें

कोई गाय सागर के किनारे मरुस्थल में खड़ी मिल सकती है
क्या वह ध्यान कर रही होती है तरणितनूजातट की तमाल पंक्ति का
गोपियों के गीत या वंशी के मधुर रव जहाँ से फूटते रहे हों
और ग्वाला बजाता हो बाँसुरी

कोई गाय अकेली छूट गई बाज़ार में भटकती है
वह चुपचाप सह लेती है लोढ़ों की मार
भरी दुपहर वह डामर की तपती सड़क पर चल रही होती है
और जहाँ-तहाँ मार खाती है लाठियों की

राजनीति के चक्रव्यूह में फँसी
कभी इस दल के दलदल में कभी किसी कमंडल के जल में
वह चाहती है उसे केवल
एक जानवर होने का
पूरा हक़ तो मिले।

उसके लिए बिला गए हैं अब छायादार पेड़
जिनके नीचे हरी घास उगी हो
पास में पानी के डाबरे और साफ़ हवा सहलाती उसका तन
ग्वालों का अपने हाथ से खुजलाना और डाँस निकालना उनकी देह से
भक्ति से की गई वह सारी सेवा अब नहीं है उसके लिए।
गोबर से लिपे बहू के हाथ से झाड़ू लगे घर के आगे
रसोई में उसके लिए अलग निकालकर रख दी गई पहली रोटी
बछड़े के जीभ से चाटना और थनों से उसके झरता दूध
यह सब उसकी स्मृति में है
यह जो गाय
ले जाई जा रही है बूचड़खानों में।

अब गोधूलि नहीं होती
न गोष्ठी सजती है, न गोपायन
समाप्त है गवेषणा। धुँधला गई है गोरोचना की छवि।
अब नहीं होता है गोत्रस्खलन। गोजागर हो गया है मूर्च्छित।
सब कुछ गोपद में निमग्न है या गोलोक में कहीं स्थित।

छोटी होती जा रही है धरती
घास भी कहाँ मिल पाती है सुविधा से
न पानी ही मिल पाता है
चारों ओर से उठ खड़ा हुआ है यह जो भवनों का जंगल
उसके बीच त्रस्त गायें
क्या सीता की तरह भूतल में समा जाएँ?

© श्री राधावल्लभ त्रिपाठी एवं साभार साहित्य अकादेमी

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4 thoughts on “शहर में गायें

  1. गाय की यह दुर्दशा भारतीय जनमानस की नैतिकता के ह्रास की गाथा है! दुमुंहे समाज की!😦

    • गाय तो सीता द्वारा शापित जीव है। राम और लक्ष्मण की अनुपस्थिति में महाराजा दशरथ के पिण्डदान के समय अर्ध्य न होने पर सीता ने फल्गु नदी के रेत को अर्पित किया और जिसको स्वीकार कर लिया गया। सीता ने कहा कि राम और लक्ष्मण इस बात को सच नहीं मानेंगे कि श्राद्ध की पूजा संपन्न हो गयी है। राम और लक्ष्मण पूजन सामग्री को लेने के लिए समीप के गाँव गए थे और आकाशवाणी के अनुसार शुभ मुहूर्त निकला जा रहा था।
      सीता ने अर्ध्य अर्पित करते समय पूछा कि इस बात का साक्षी कौन बनेगा कि पूजा सम्पन्न हो गयी है। इस पर आकाशवाणी हुई कि फल्गु नदी, केतकी फूल, गाय और अग्नि इस बात की गवाही देंगे। लेकिन ये सभी राम और लक्ष्मण के सामने साक्ष्य देने से मुकर गए और सीता उपहास का पात्र बन गयीं। इस पर सूर्य ने कहा कि पिण्डदान सीता द्वारा संपन्न हो चुका है। क्रोधित सीता ने चारों को श्राप दिया; कि फल्गु नदी का जल सूख जायेगा, केतकी फूल को शिव को नहीं चढ़ाया जायेगा, गाय का अग्र भाग पूजनीय नहीं रहेगा और ये झूठा खाती फिरेगी और अग्नि अच्छे-बुरे सबको जलायेगी।
      खैर ये तो किवदंती है, सच तो ये है कि गाय से मिलने वाला दूध इसको माँ का दर्ज़ा दिलाये हुए है। बैल, साँड और भैंसों का और भी बुरा हाल है।
      भैंसों के साथ होने वाली ज्यादती को प्रसिद्ध चिन्तक कांचा इल्लैया ने अपनी पुस्तक ‘Buffalo Nationalism: A Critique of Spiritual Fascism’ में बड़ी तफसील से बयाँ किया है।

  2. Is this Radha Vallabh Tripathi the same as the VC of rashtriya Sanskrit Sansthan?

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