Sushil Kumar's Blog

straight from my heart and soul

ईश्वर और मनुज

Gulshan Kumar

और वे कहते हैं
कि ईश्वर बड़ा दयालु है
परोपकारी है
सर्वज्ञ है
माँ की ममता से बड़ी है उसकी छाँव ।
कलियुग का ईश्वर
हो गया है स्वार्थी
छलिया
अधम पापी
हो गया है मानवीय गुणों से आच्छादित ।
नहीं सोचता किसी की
नहीं देखता किसी के दुःख
आँखें मूँदें तपस्या में लीन
बड़बड़ा रहा है कुछ अपने आप से ईश्वर ।
आँखें खोल के फिर मूँद लेता है
प्रकृति की विभीषिका से धमकाता
फुसलाता, डराता
अपने कुनबे को बचाकर
करता अट्टहास ।
यज्ञ के अंतिम होम के बाद
बरसाता प्रलय के मेघ
उमड़-घुमड़ के आते चक्रवात ।
स्वार्थी ईश्वर का घर
टिका रहता पुरी के समुद्री चक्रवात में
देवभूमि के जल-प्रलय में ।
भक्त खुद को खोजते
ईश्वर के होने न होने में
ईश्वर हँसता, ईश्वर मुस्कुराता
ईश्वर मौन, ईश्वर चुप्प
भक्त सन्न ।
और फिर से व्याकुल
खोजने चलता
नित् नये ईश्वर
जिन्हें वो बनाता
रेत के घरौन्दा सा
बनाता, मिटाता
और स्वयं ही ईश्वर को
चुनौती देता ईश्वरत्व का ।
ईश्वर फिर भी चुप्प
खामोश दीर्घ तप में लीन
आँखें खोल फिर मूँद लेता
चुप सा ।

© सुशील कुमार

छवि साभार: www.oldindianphotos.in

छवि साभार: http://www.oldindianphotos.in

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12 thoughts on “ईश्वर और मनुज

  1. Shekhar Sathe on said:

    Nice. Every disaster is a cumulative effect of small changes and each small change is the work of Nature as much as it is of Man. Ishwar has nothing to with this as Ishwar herself is the cumulative effect of unnatural changes made by Man.

    • Thank you so much for your erudite comment. It’s a delight to hear from you after a long gap. I think Ishwar seems to be a biased entity. Those who rob natural resources, riverbeds, forests, mountains are rich and mighty and those who suffer nature’s fury are mostly poor and helpless people.😀

  2. MAHADEVA S. SARMA on said:

    Are you among those who believe Man made God or among those who think God made Man and the world? If you are among the latter group then this poem is “bhakt kI ulaahnaa”. If you are definitely among the former group then this poem sits well.

    • गुरु जी आप मुझे विभ्रान्ति में डाल दिए कि मैं किस गुट का हूँ। अब कवि-मन तो किसी की भी खिंचाई कर सकता है। जिन घटनाओं को हम भय और आक्रोश से धर्म-अधर्म, पाप-पुण्य, पूर्व जन्म के कर्मफल, प्रकृति का प्रतिशोध, ईश्वर का अन्याय, प्रकृति की निजता पर अतिक्रमण का प्रकोप जैसा मान बैठते हैं वो दरअसल बेहद मामूली सी भू-गर्भीय हलचलें हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार हमारी पृथ्वी के गर्भ में ‘टेक्टोनिक प्लेट्स’ हैं जो लगातार चलायमान हैं लेकिन कभी-कभी इनकी मटरगश्ती से सुनामी, ज्वालामुखी का फटना, भूकंप, भू-स्खलन, द्वीपों का सरकना, ज़मीनों का उभरना-दबना, गर्म जलस्त्रोत बनना जैसी नित्य-प्रति तुच्छ घटनाएँ होती रहती हैं। नेशनल जियोग्राफिक मैगज़ीन की मानें तो हर वर्ष १० लाख से ऊपर भूकंप आते हैं जिनमें से आधे ही मनुष्य को आभाषित होते हैं।
      सोचिये ज़रा, देवभूमि में मानव जाति और ईश्वर जाति के लोगों को नुक्सान न पहुँच कर मात्र वन्य जीव-जन्तुओं को नुक्सान पहुँचता तो इतना हो-हल्ला न मचता, हमारे इतने आँसू न टपकते।
      यूँ कि मेरी कविता के मूल पात्र ईश्वर और उनकी निरंतर ख़ामोशी है और दोनों चित्र भी ये इंगित कर रहे हैं कि चाहे एक भक्त शिव-मंदिर में मारा जाए या फिर सैकड़ों लेकिन भोले बाबा की तपस्या में विघ्न नहीं पड़ता। जय बम भोले। ॐ नमः शिवाय।😀

  3. mamta on said:

    sundar, bhav purn kavita …sadhuvaad

    • जी बहुत-बहुत धन्यवाद्! बिना आपके नाम के सहारे ये कविता अपूर्ण रहती।😀

  4. पता नहीं, पापी भी उनकी देन है और दयालू भी। खेल उन्ही का है। अंतत: उन्हे शायद सब समेटना हो…

    • ये समेटने का ट्रेलर भी हो सकता है, गीता में कृष्ण स्वयं कह रहे हैं –
      प्राप्त होने योग्य परमधाम, भरण-पोषण करने वाला, सबका स्वामी, शुभाशुभ देखने वाला, सबका वासस्थान, शरण लेने योग्य, प्रत्युपकार न चाह कर हित करने वाला, सबकी उत्पत्ति-प्रलय का हेतु, स्तिथि का आधार, निधान और अविनाशी कारण भी मैं ही हूँ ।।१८।। अध्याय ९
      मैं ही सूर्यरूप से तपता हूँ, वर्षा का आकर्षण करता हूँ और उसे बरसाता हूँ। हे अर्जुन! मैं ही अमृत और मृत्यु हूँ और सत-असत भी मैं ही हूँ ।।१९।। अध्याय ९
      मैं सबका नाश करने वाला मृत्यु और उत्पन्न होने वालों का उत्पत्ति हेतु हूँ तथा स्त्रियों में कीर्ति, श्री, वाक्, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा हूँ ।।३४।। अध्याय १०

  5. manav on said:

    मनुष्य एक ऐसा प्राणी है जो अपने से कई गुना बङा प्राणी को अपना गुलाम बना लिया ,इसे देख भगवान भूमि लोक छोङ कर भाग गया है भूमि पर भगवान है कहाँ जो अपने भक्तो पर दया दिखा सके , भगवान तो आज भयभीत है कि कही उसे भी ये मनुज जात गुलाम न बना ले

  6. मनुष्य एक ऐसा प्राणी है जो अपने से कई गुना बङा प्राणी को अपना गुलाम बना लिया ,इसे देख भगवान भूमि लोक छोङ कर भाग गया है भूमि पर भगवान है कहाँ जो अपने भक्तो पर दया दिखा सके , भगवान तो आज भयभीत है कि कही उसे भी ये मनुज जात गुलाम न बना ले

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