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Archive for the category “पंचवर्षीय कट्टर सरकार के ख़िलाफ़”

असली गाँधी – नकली गाँधी

Imageबहुत से बुद्धूजीवी गाँधी बाबा के सत्य के प्रयोग, उनके ब्रह्मचर्य पर किये गए प्रयोगों से जोड़ कर देखते हैं, लेकिन गाँधी बाबा ने ये प्रयोग दक्षिण अफ्रीका में 22 साल किये, इंग्लैंड में भी किये और भारत में भी अपनी अंतिम सांस तक किये। कुछ लोगों ने गाँधी बाबा के अनशन और सविनय अवज्ञा आंदोलन का चीप संस्करण निकालना चाहा, दांडी-यात्रा में नमक बना कर क़ानून तोड़ने की नक़ल बिजली के तार जोड़ कर की, जनता के बीच जनमत संग्रह कराया लेकिन सत्य के प्रयोगों से मात्र तीन साल में ही उकता कर एक से बढ़कर एक सफ़ेद झूठ बोले, बच्चों की झूठी कसमें खायीं, गाँधी बाबा के लंगोट की तरह मामूली आदमी की तरह मफ़लर लपेटा लेकिन सब व्यर्थ गया, तीन साल के सत्य के प्रयोगों में तीस साल के सत्य के प्रयोगों के तप का बल न था।
गाँधी बाबा ने अपने रसूख़ का बेजा इस्तेमाल नहीं किया, न आज़ाद भारत की सत्ता भोगी और न चंदे के पैसों को अपनी तिज़ोरी में ठूँसा। ग़ैर-बुद्धूजीवी कट्टर हिन्दू गाँधी बाबा को इसलिए कोसते हैं क्यूंकि उन्होंने बंटवारे के बाद मुसलमानों को पाकिस्तान जाने से रोका और हिन्दुओं द्वारा मुसलमानों का जी भर कर क़त्ल-ए-आम करने से रोका और इसके लिए अनशन तक किया। उग्र ब्राह्मण इस बात का गर्व भी करते हैं कि इस गाँधी बाबा को एक ब्राह्मण ने ही वध किया, वध शायद राक्षसों का किया जाता है या फिर पशुओं का।
उधर बाबा रामदेव ने ख़ुद को चुनावी नतीज़े के तीसरे दिन बाद ही अपनी तुलना गाँधी बाबा से की है, गाँधी बाबा एक व्यावसायिक घराने से थे लेकिन ख़ुद कभी धन्धा नहीं किया, वकालत की, जन-आंदोलन चलाया, भारत माता की जय के साथ ही महात्मा गाँधी की जय का स्वतंत्रता सेनानी हुंकार भरते थे।
गाँधी बाबा ने अंग्रेजी हुकूमत से अहिंसात्मक लड़ाई लड़ी, अंग्रेज़ों को कभी कटुवचन नहीं बोले, कोई गाली-गलौज नहीं, कोई ग़िला-शिक़वा नहीं, हमेशा मर्यादा में रहे। 31 साल तक सत्याग्रह आंदोलन चलाया, आंदोलन हिंसक होने पर आंदोलन रद्द भी कर दिया, कोई जल्दबाज़ी नहीं दिखाई, कभी किसी सेना बनाने की बात नहीं की, किताब लिखी, एक-एक पत्रों के ज़वाब रोज़ सुबह चार बजे उठ कर लिखे, तीन समाचारपत्र भी चलाये। दक्षिण अफ्रीका से आने के बाद भारत के गाँव-गाँव भ्रमण किया, देश को जाना-समझा, कतार में खड़े आखिरी आदमी का दर्द समझा, लेकिन अपनी तुलना ईसा मसीह से नहीं की, अपनी गलतियों को स्वीकारा भी, लेकिन अपनी लोकप्रियता को भुनाया नहीं। अकूत धन जमा नहीं किया, द्वीप नहीं ख़रीदे, पाँच-सितारा आश्रम भी नहीं बनाये। अंग्रेजों के भारत छोड़ने का श्रेय भी नहीं लिया।
वकालत करने के बाद गाँधी बाबा ने 57 साल तक सार्वजनिक जीवन जिया। यहाँ 3-4 साल के आंदोलनकारी ख़ुद की बराबरी गाँधी बाबा से करना चाह रहे हैं। गाँधी बाबा ने बँटवारे के बाद के दंगों में न्यूटन को याद भी तो नहीं किया था। यह कैसा कलयुग है कि ख़ून के प्यासे ख़ुद की बराबरी महात्मा गाँधी से कर रहे हैं?
© सुशील कुमार
छवि साभार: https://www.facebook.com/Outlookindia

 

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