Sushil Kumar's Blog

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Archive for the category “Satire”

अच्छे दिन

UPA - III छवि साभार: शेखर गुरेरा

UPA – III छवि साभार: शेखर गुरेरा


कडु दवा खवाए के
मोदी करें उपचार
रेल करावा बढ़ गवा
अच्छे दिन अबकी बार
ओ भैया अच्छे दिन इस बार
दरोगा कटहल चोर पकरें
नेता करें बलात्कार
जनता करे हाहाकार
बिजली गई, पानी गया
आँखों से इस बार
अच्छे दिन आ गए
मोदी के इस बार
तेल पियें अडानी का
अंबानी को बनी गैस
सूँघे मोदी सरकार
अच्छे दिन आ गए
मोदी के इस बार
महँगाई जब सताए तो
पियें नमो-टी हर बार

© सुशील कुमार 

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दादागिरी

एक रहिन दादा जी। उन्हें हर जवां कन्या में अपनी पोती नज़र आती तो उनका हृदय उसे गोदी में लेकर खिलाने को मचल उठता। वे अन्य दादाओं की दादागिरी को नापते, भाँपते और प्रेम-पूर्वक मानवकल्याण हित की बात कह गोलमोल टाल जाते৷ ऐसे ही हर तरफ़ दादाओं का हुज़ूम था৷ ये दादा साहित्य जगत में होते तो इस वात्सल्य भाव को हंसी ठिठोली में ‘ठरक’ कहते और जीवन भर के कल्याणकारी कर्मों पर कालिख पोत कर काल कवलित हो जाते৷ एक दादा जी अपनी पोती के सर से बुरी आत्मा खदेड़ने का यज्ञ करते और पोती कहती बस करो दादा जी, बस करो दादा जी… बहुत हुआ, फिर भी दादा जी का मन न भरता। एक दादा जी को सिर्फ एक पोती नहीं बल्कि कई पोतियों से प्रेम था৷ वे अपने रसूख से नई-नई पोतियाँ बनाते और उनके साथ छिपन-छिपाई खेलते और उनका जैविक पुत्र कोर्ट कचहरी में पूजनीय दादा जी के ब्लड सैम्पल के लिए भटकता रहता৷ बाद में यह देखा और पाया गया कि उन्होंने टीवी माध्यम से अवाम तक यह सन्देशा पहुँचाया कि वे आज़ादी की लड़ाई के सिपाही रहे हैं और देश हित और जन-कल्याण के लिए कुछ भी कर सकने के लिए सदैव तत्पर हैं৷ एक दादा जी अपने नौकर के साथ रहते और घर की साफ़ सफाई के लिए पोतियों को नौकरी पर रखते फिर वे पोतियाँ गायब होने लगतीं और हद तो तब हुई जब उन्हें पोतों में भी पोतियाँ नज़र आतीं और वे पोते-पोतियों को बड़े करीने से काँट-छाँट कर पन्नी की थैलियों में भर कर नालों में ड़ाल देते। वैज्ञानिक बताते कि पन्नियाँ छह सौ बरस तक नहीं सड़तीं और पर्यावरण के लिए गम्भीर ख़तरा हैं৷ मानव देह और हड्डियाँ कब तक न सड़तीं इस बारे में शोध करना वैज्ञानिकों को रूचिकर न लगता৷
ग़रीब घर के पोते-पोतियों को जीवन-मरण के चक्र से छुटकारा दिलाने वाले दादा जी को जब पुलिस बड़े पंचायत लाती तो पंचों की यह राय बनती कि दादा जी तो उस वक़्त भारत में नहीं थे, ज़रूर यह सब दुष्कृत्य दादा जी के नौकर ने किया है৷ साफ़ सुथरी छवि के दादा जी के नौकर को फाँसी पर चढ़ाने का फ़रमान सुनाया जाता। दादाओं दादाओं में ख़ूब बनती, वे आपस में ख़ूब कहकहे लगाते, उनके पोपले मुँह उनकी मासूमियत पर मुहर लगाते৷
दादाओं की एकता से नौजवान भी शीघ्र दादा बनने की तमन्ना पालते৷ सभी दादा जी एक सुर में कहते बच्चे किसे नहीं अच्छे लगते? और वे फिर नई पोतियाँ तलाशते अपना असीमित प्रेम उड़ेलने के लिए। और इसके बाद दोस्तों शिवपालगंज में सभी दादा हँसी ख़ुशी दिन बिताने लगे৷
© सुशील कुमार

छवि साभार: mei-lovedrawing.deviantart.com

छवि साभार: mei-lovedrawing.deviantart.com

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