Sushil Kumar's Blog

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Archive for the category “Science”

विज्ञान बनाम धर्म

ब्रह्माण्ड की संरचना और जीवन की उत्पत्ति, इन दो प्रश्नों ने हमारे पूर्वजों को बहुत उद्वेलित किया है, सभी धर्मों के शास्त्र इस पहेली में उलझते रहे हैं। मसखरेपन की हद ये रही है कि सभी धर्मो के ग्रंथों ने अपने-अपने ग्रन्थ ईश्वरीय अथवा दैवीय घोषित कर रखे हैं और जो इनपर प्रश्न उठाये वो नास्तिक, या फिर धर्म विरोधी बता कर दरकिनार कर दिया जाता है। अगर गौर से इन ग्रंथों को पढ़ेंगे तो पाएंगे कि किस तरह से असुरक्षित पुरुषों ने घर और समाज में अपने वर्चस्व को बनाये रखने और स्त्री को पैर की जूती बनाने वाले ये धर्म-ग्रन्थ लिखे हैं और पुरुष की वाणी को ईश्वरीय बताया है, हिन्दू धर्म की त्रिमूर्ति, ईसाईयत का गौड़ और इस्लाम का अल्लाह, ये सब पुरुष शक्ति के धोत्तक हैं।
वहीँ दूसरी तरफ विज्ञान ने ईश्वर शब्द का प्रयोग न कर अदृश्य शक्ति को प्रकृति अथवा नेचर की संज्ञा दी है। विज्ञान हमेशा अचंभित करता है, नई थ्योरियाँ लाता है और फिर उनको फिर से परिभाषित किया  जाता है, वो थ्योरियाँ गलत साबित की जाती हैं, और फिर एक नई परिष्कृत थ्योरी सामने आती है, डार्विन से पहले तक ईसाई यही मानते थे की सृष्टि को छह दिन में ईश्वर ने रचा, कट्टर धर्मावलम्बी अभी भी बाईबल में लिखी बात अक्षरशः सत्य मानते हैं। मज़े की बात ये है कि सारी दुनिया में बाईबल के बाद ‘ओरिजिन ऑफ स्पीसिस ही’ सबसे बिकने और पढ़ी जाने वाली किताब रही है। ईसाईयों द्वारा डार्विन की थ्योरी अपना लिए जाने के बाद इस्कॉन संस्थान ने डार्विन और बिग-बैंग थ्योरी का मखौल उड़ाने का ठेका ले रखा है, विज्ञान पर चर्चा होने के दौरान एक भक्त ने बताया कि इस्कॉन-संस्थापक ने नोबल प्राइज विजेता वैज्ञानिकों को ‘गधा’ बताया है, मैंने पूछा कि क्या आप गधे हैं? कोई जवाब नहीं मिला, दुबारा पुछा कि क्या आप गधे हैं? जब तीसरी बार पुछा कि आप गधे हैं या नोर्मल इंसान तो जवाब मिला कि ‘मैं तो नोर्मल इंसान हूँ’, मैंने कहा कि आप नोर्मल और अपना सारा जीवन आविष्कार और शोध में लगाने वाला गधा! असली गधा कौन है?
जब आप अपने कीमती मोबाईल पर बात कर रहे हों या फिर टीवी पर अपना मनपसंद धारावाहिक देख रहे हों तो ये मत भूलना कि इन सब वैज्ञानिक उपलब्धियों के लिए निकोलस कोपर्निकस और गैलीलियो गैलिली ने कट्टर कैथोलिक चर्च के अत्याचार सहे थे। पृथ्वी और अन्य ग्रहों की कक्षाएं और आकाश-गंगा में उनकी सही खगोलीय स्थिति से ही हमें रोजमर्रा की बहुत सी जानकारियाँ मिल रही हैं और हम टीवी और मोबाईल का लाभ उठा पा रहे हैं। इसमें मुझे तनिक भी आश्चर्य नहीं होता कि मस्जिद से कठमुल्ले लाउडस्पीकर पर बोलते हैं कि साइंसदा झूठ कहते हैं कि पृथ्वी सूरज का चक्कर लगा रही है जब कि कुरान कहता है सूरज पृथ्वी का चक्कर लगा रहा है।
सर्न (CERN) लैबोरेटरी की सफलता के बाद कट्टर हिन्दू खींसे निपोर कर कह रहे हैं कि अजी जाने दीजिये हमें तो पहले से ही पता था कि कण-कण में ईश्वर विद्यमान है। आखिर बईमानी की कोई हद नहीं होती है! कुछ उन्मादियों ने इस सफलता के पीछे भगवान शिव की मूर्ति का आशीर्वाद बताया है जो कि भारत के Atomic Energy Commission (AEC) के मेंबर अनिल काकोडकर द्वारा सरन लैबोरेटरी को एक भेंट मात्र थी। मीडिया में हिग्स-बोसोन पार्टिकल को God Particle के रूप में प्रस्तुत किया गया है, सनसनी फैलाने के लिए। जबकि खोज इस बात की हुई है कि matter या पदार्थ में भार किस वजह से होता है, यही ‘वजह’ इस प्रयोग का आधार था। नोबल पुरस्कार प्राप्त वैज्ञानिक लियॉन एम. लेडरमान यूँ तो यहूदी हैं लेकिन हैं तो आखिरकार नास्तिक ही। लियॉन एम. लेडरमान की प्रसिद्ध पुस्तक – The God Particle: If the Universe Is the Answer, What Is the Question? का मूल टाईटल था – The ‘Goddamn’ Particle: If the Universe Is the Answer, What Is the Question? प्रकाशक ने टाईटल के ब्लासफेमी से बचने के लिए इसको God Particle नाम दे दिया और मीडिया के अनुसार हमें God Particle अर्थात ईश्वर की खोज में अब तक की सबसे बड़ी कामयाबी मिली।
चिंता न करें, ईश्वर, अल्लाह और गौड़ को इंसान मुश्किल घड़ी में याद करता है लेकिन विज्ञान इंसान के हर वक़्त पर काम आता है। आस्तिकों के आस्तिक होने का अर्थ है स्वार्थी होना… अपनी असफलता का ठीकरा भगवान पर फोड़ देना और सफलता के लिए अपने आप को भगवान का खासम-खास साबित करना।

© सुशील कुमार

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