Sushil Kumar's Blog

straight from my heart and soul

Archive for the category “Uncategorized”

चाँद का इवन-ऑड फॉर्मूला

आँगन से पूर्णिमा का चाँद
झाँक रहा है बेझिझक
यहाँ कुदरत के इवन-ऑड फॉर्मूले से
चाँद निकलता है अपने रस्ते
चौदह दिन गुम
चौदह दिन झिलमिल
यहाँ है मेरे हिस्से का
आँगन, चाँद और आस्माँ
दिखता है बिलकुल साफ़ – तुमसा
यहाँ की सड़कों पर अभी भी
आदमियों से कम हैं गाड़ियाँ
मेरे आँगन से चाँद दिखता है
बिलकुल साफ़ – तुमसा

© सुशील कुमार

छवि साभार – Rick BaldridgeFull Moon © Rick Baldridge

Advertisements

Why They Hate Each Other: Behind the Sunni-Shi’ite Divide

Why Shia-Sunnis hate each other?

TIME

You are getting a free preview of a TIME magazine article from our archive. Many of our articles are reserved for subscribers only. Want access to more subscriber-only content? Click here.

[time-related-module]

It has come to this: the hatred between Iraq’s warring sects is now so toxic, it contaminates even the memory of a shining moment of goodwill. On Aug. 31, 2005, a stampede among Shi’ite pilgrims on a bridge over the Tigris River in Baghdad led to hundreds jumping into the water in panic. Several young men in Adhamiya, the Sunni neighborhood on the eastern bank, dived in to help. One of them, Othman al-Obeidi, 25, rescued six people before his limbs gave out from exhaustion and he himself drowned. Nearly 1,000 pilgrims died that afternoon, but community leaders in the Shi’ite district of Khadamiya, on the western bank, lauded the “martyrdom” of al-Obeidi and the bravery…

View original post 4,375 more words

असत्यमेव ज्यादा जयते?

आजकल इंटरपास (या फेल?) आमिर खान डॉक्टरों को निशाना बना रहे हैं। २००४ में कीटनाशक विवाद के दौरान वो टीवी विज्ञापन में कोका कोला की फैक्ट्री का भ्रमण करा रहे थे और ये फरमा रहे थे कि विवाद महज बकवास है और कोका कोला सेफ है। संसद में कई दिनों तक बहस चली, और बात जब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची तो रसायन शास्त्र में लगभग अनपढ़ नेता और जज ये तय नहीं कर पाए कि कोका कोला को किस श्रेणी में रखा जाये – फ़ूड या वाटर? जब बात उनके पल्ले नहीं पड़ी तो बात आई-गई हो गई। सेंटर फॉर साइंस एंड इनवायरेंमेंट की सारी रिपोर्ट धूल चाटने पर मजबूर कर दी गयीं। एक वैज्ञानिक सुनीता नारायण का कद छोटा साबित करने के लिए गुलाबी अख़बार रोज इंदिरा नूयी के गुण गाने लगे। पेप्सी और कोका कोला उन दिनों पांच ₹ में बिकने लगा था। आमिर खान बॉलीवुड के सम्मानित सितारे हैं, कुशल कलाकार हैं, सरदार सरोवर डैम प्रसंग के बाद से उनका एक्टिविस्ट का नया चेहरा भी सामने आया। हमारी उनके साथ सहानुभूति रही, उनकी फिल्म गुजरात में बैन की गई इसका खेद भी रहा। उन्होंने ‘तारे ज़मीन पर’ बना कर दर्शकों को अपनी निर्देशकीय प्रतिभा से अवगत कराया। फिल्म बेहद अच्छी थी और बच्चों को चूहा दौड़ में शामिल न करने को अभिभावकों के प्रति सन्देश सफलता पूर्वक पहुंचाने में कामयाब रही। वो मंझे हुए कलाकार हैं, साल में एक या दो ही फिल्म बनाते हैं, अब रीयलटी शो में हाथ आजमा रहे हैं। दर्शकों को रुलाने पर वो कामयाब रहे हैं और गूगल पर उनका शो उनके नाम से भी ज्यादा रिसल्ट दे रहा है।
मैं उनका शो नहीं देखता, ऐसा नहीं है कि घर में टीवी नहीं है, या फिर केबल नहीं है। उनका पहला शो कन्या-भ्रूण हत्या पर था, लगभग दो हफ्ते तक मैंने वो शो नहीं देखा, फेसबुक और अख़बार से मालूम चला कि आमिर खान क्रांति की नई बयार चला रहे हैं। जब तसलीमा नसरीन ने भी आमिर खान के शो पर प्रश्न-चिन्ह उठाया तो मैंने सोचा कि देखें आखिर इस शो में क्या है, तब मैंने यू-ट्यूब में उस शो को देखा और यकीन मानिये इस तरह के शो बहुत ही शातिर दिमाग के लोग बनाते हैं, कुछ पल को मैं भी भावुक हो गया था लेकिन ये सब क्षणिक था। जब आप आंसू बहा रहे होते हैं तो वो अपना मुनाफा काट रहे होते हैं। क्या अधिकांशतः लोग इस मुद्दे से पहले वाकिफ़ नहीं थे? अगर थे तो आमिर खान की वाहवाही करने से पहले उनको ये भी सोचना चाहिए था कि वो खुद सो क्यूँ रहे थे, गंभीर सामाजिक मुद्दों से लोग खुद ही उदासीन रहते हैं। उस शो में नया कुछ भी नहीं दिखाया गया फिर भी उस शो ने TRP के सारे कीर्तिमान तोड़ दिए, क्या दर्शकों को सनसनी पसंद है? या फिर स्टार-कास्ट?
एक शो में डॉक्टरों की खिचाई की गई, वो शो मैंने नहीं देखा है, मालूम पड़ रहा है कि देश भर के डॉक्टर लामबंद हो रहे हैं आमिर खान के खिलाफ, इसका एक पहलू ये भी है कि आप विवाद खड़ा करें और मुफ्त की पब्लिसिटी बटोरें।
देश ने कई तरह के रीयलटी शो देखें हैं, उत्कृष्ट गायक, उत्कृष्ट नृतक, रीयलटी शो का स्वयंवर, रीयलटी शो की बहू, रीयलटी शो के प्रेमी-प्रेमिका, रीयलटी शो के अभिभावक। लेकिन आमिर खान अब रीयलटी शो में दफ़न पड़े मुद्दे उठा रहे हैं। किसानों की आत्महत्या को दहेज से जोड़ रहे हैं, डॉक्टरों को दवा कंपनियों के हाथों बिका हुआ दिखाया जा रहा है और दर्शक मुग्ध हैं कि कोई तो बहादुर आया जो ऐसे मुद्दे उछाल रहा है। लेकिन इसमें बहादुरी की कोई बात नहीं है ये सब शुद्ध व्यापार है। तुम मुझे अपना गैर-कीमती वक़्त दो, अपने आंसू दो और हम अपना बैंक बैलेंस बढ़ाएं – दोनों हाथ में लड्डू!

यही मुद्दे नलिनी सिंह पिछले बीस साल से अपने कार्यक्रम – ‘आँखों देखी’ में उठा रही हैं, क्या आपने जानना चाहा कि नलिनी सिंह क्या बोलती हैं, नहीं, क्यूँकि वो स्टार नहीं हैं। आप अपने आंसू तभी बहायेंगे जब आमिर चाहेंगे, नहीं तो नहीं। नलिनी सिंह सरकारी दूरदर्शन तक सिमट कर रह गई हैं, काश वो भी समाचार बेचने को व्यापार बना पातीं तब आप उनको देखते। क्यूँ? सच बात यही है न।
© सुशील कुमार
Doctors want Aamir Khan to apologise after Satyamev Jayate episode

http://www.dnaindia.com/entertainment/report_doctors-want-aamir-khan-to-apologise-after-satyamev-jayate-episode_1696485

शहर में कर्फ्यू

Image

इलाहाबाद जितना ही कुम्भ-मेला, इलाहाबाद यूनिवर्सिटी, यहाँ के कवि-साहित्यकारों, नेताओं, कलाकारों की वजह से जाना जाता है उतना ही कभी दंगे-फसादों और कर्फ्यू की वजह से भी जाना जाता था, स्वाधीनता संग्राम में तो इलाहाबाद स्वयं आन्दोलन का पर्याय बन गया था। ‘शहर में कर्फ्यू’ ये एक लघु-उपन्यास का नाम भी है, जो कि विभूति नारायण राय द्वारा लिखा गया है। दंगे की व्यावसायिकता, दंगे का अर्थ-लाभ, राजनीतिक गठजोड़, दंगाग्रस्त लोगों की व्यथा, दंगा भड़काने वालों की मानसिकता और दंगों का पूरा पोस्ट-मार्टम करता है ये उपन्यास। आला पुलिस अधिकारी, धार्मिक गुरु और नेताओं के गठबंधन से दंगे किस-किस तरह से कराये जाते हैं और उनका एकमात्र लक्ष्य गरीब मुस्लिम होते हैं इस पर जो भी लिखा गया है वो अद्भुत है। लेखक स्वयं भारतीय पुलिस सेवा में आई.पी.एस. रह चुके हैं और इस समय वर्धा के हिंदी अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के उप-कुलपति हैं। विश्व हिन्दू परिषद् द्वारा इस किताब को सार्वजनिक रूप से फूंका जा चुका है लेकिन लेखक बेबाकी से अभी भी धर्म के ठेकेदारों का पर्दाफाश कर रहे हैं।

Image
खैर ये तो एक किताब की चर्चा तक ही सीमित रह जाने वाला मुद्दा नहीं है। १९८६, १९८८, १९९०, १९९२ हर अगले साल कर्फ्यू लगता था। एक दिलचस्प वाकया ये है कि जून १९८६ को भी हमारे इलाके में कर्फ्यू लगा था और पिताजी ने सोचा कि क्यूँ न छुट्टी का सदुपयोग करने कानपुर चला जाये। फिर क्या पिताजी मुझे भी साथ में ले गये, पिताजी को इलाहाबादी दंगो से डर नहीं लगता था क्यूँकि वो मणिपुर में कई नर-संहार देख चुके थे इसलिए खून-खराबा कोई नई बात नहीं थी। जब हम घर से निकले तो सड़कें सूनसान थीं और पुलिस वाले भी नज़र नहीं आ रहे थे, रास्ते में एक मुस्लिम बस्ती आयी तो वहाँ चौपाल लगा के बैठे लोगों ने आगाह किया किया कि आगे संभल के जाना हिन्दू बस्ती है! जब हम अगली बस्ती गए तो वहाँ हैंडपंप से पानी भर रहे लोगों ने टोका कि बाबूजी आगे संभल के जाना मुसलमानों का टोला है। ऐसे ही बस्तियां पार कर हम सुरक्षित रेलवे स्टेशन पहुँच गए।
आज ये सब इस लिखा क्यूँकि आज शाम इलाहाबाद में हमारे इलाके में बम-विस्फोट हुआ और छह लोग मारे गये, मरने वालों में गरीब मुस्लिम बंगलादेशी आप्रवासी हैं। लेकिन यह कहना भी गलत होगा कि मरने वालों में हमेशा मुस्लिम ही मरते हैं। १९९२ को बाबरी-मस्जिद विध्वंश के बाद हमारे घर से दो किलोमीटर की दूरी पर मन्दिर के पुजारी को बम मारकर उड़ा दिया गया था और ये भी उतनी ही सच बात है कि बम, कट्टा और देशी असलहों को बनाने में मुस्लिम धर्म के निम्न-वर्गीय लोग संलिप्त हैं और कईयों के लिए ये कुटीर उद्योग भी है। इलाहाबाद शहर से बाहर बसा मऊ-आईमा क्षेत्र गोला-बारूद, बम और पटाखों का गढ़ बन चुका है जहाँ शादी-बारात, दिवाली, शब-ए-बारात जैसे मौकों के लिए तय मानक सीमा से बाहर के खतरनाक विस्फोटक तैयार किये जाते है जो कि कुटीर उद्योग का रूप ले चुका है।

जो हिट है क्या वही फिट है?

हर साल अख़बार के मुख्य पृष्ठ पर आई. ए. एस., आई. आई. टी., सी. बी. एस. ई., आई. सी. एस. सी. के टॉपरों की मुँह फाड़ती फोटो देखने को मिलती है और अगले दिन उस अनाथ को हर कोचिंग संस्था गोद लेने को उत्सुक होती है। पूरे-पूरे पेज का विज्ञापन आता है कि ये वारिस उसी की वैध संतान है?? ऐसा आखिर क्यूँ होता है… भारत की सरकार मूर्ख है या फिर हम पब्लिक मूर्ख हैं जो ये नहीं समझ सकते कि एक ही बच्चा कोटा-राजस्थान और दिल्ली की फिट-जी कोचिंग में क्लास कैसे ले रहा था जबकि उसका घर फरीदाबाद में है। ख़ैर मुझे शिकायत इन कोचिंग संस्थाओं से नहीं है, टॉप करने वालों से भी कोई गिला-शिकवा नहीं है लेकिन आश्चर्य तब होता है जब आई. आई. टी. से बना इन्जीनियर इन्जीनियरिंग न करके प्रबंधन संस्थाओं में घुस जाता है या फिर सिविल सर्विसेस में… अब अगर कोई अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान की टॉपर आई. ए. एस. की परीक्षा में टॉप करे तो वो मेधावी है या फिर अति-मूर्ख???
सरकारी संस्थाओं में सब्सीडाईज्ड फीस होती है, एक डॉक्टर या इन्जीनियर बनाने के लिए सरकार को पंद्रह से बीस लाख रुपये खर्च करने पड़ते हैं लेकिन वो अति-मेधावी दिव्य छात्र डॉक्टरी या इन्जीनियरिंग न करके नीली बत्ती की कार का शौकीन हो जाये तो इसमें कौन सी बुद्धिमत्ता वाली बात है? अब आप तर्क देंगे कि देश में लोकतंत्र है – जिसे जो मन में आये करने की छूट है। लेकिन असल में ये छूट नहीं लूट है, हर साल देश से चार हज़ार प्रशिक्षित डॉक्टर मलाई खाने को अमेरिका और कनाडा पलायन कर जाते हैं।
आखिर ये सब कब तक चलता रहेगा, कब तक माँ-बाप, गुरुजन इस चूहा-दौड़ में आत्म-मुग्ध होते रहेंगे, हर साल देश के विभिन्न मेडिकल कॉलेजों में, आई. आई. टी., आई. आई. एम. में दर्जनों विद्यार्थी आत्महत्या करते हैं, क्या तब इसकी जिम्मेदारी कोई माँ-बाप, गुरु या कोचिंग संस्था लेते है… सफल होने पर सब अपनी पीठ थपथपाते हैं और असफल होने पर सब कन्नी काट लेते हैं। मीठा-मीठा गप्प-गप्प और कडुआ थू-थू। आंकड़े बताते हैं कि दिल्ली यूनीवर्सिटी से बी.ए., बी. कॉम. के छात्र भी आई. आई. एम. की टक्कर का प्लेसमेंट ले रहे हैं… और जो सी.ए. होते हैं उनकी कमाई को भला कोई छू सकता है? क्या तैयब मेहता की एक पेंटिंग का मुकाबला कोई आई. आई. एम. पास आउट कर सकता है? और आई. ए. एस. बन कर देश की सेवा कौन कितनी कर पाता है ये जगजाहिर है। सबसे शर्मनाक बात ये है कि इन तथाकथित टॉपरों की शिक्षा-जगत में कोई योगदान नहीं है ये किसी भी तरह का शोध नहीं करते हैं, कोई नया रिसर्च पेपर नहीं लिखते क्यूँकि इनमे वो धैर्य और ज़ज्बा नहीं होता कि रिसर्च कर सकें… भाई मेरी नज़र में असली मूर्ख वही है जो बी.टेक या एम. बी. बी. एस.करके आई. ए. एस. बन जाये।

साधो ये मुरदों का गांव
पीर मरे पैगम्बर मरिहैं
मरि हैं जिन्दा जोगी
राजा मरिहैं परजा मरिहै
मरिहैं बैद और रोगी
चंदा मरिहै सूरज मरिहै
मरिहैं धरणि आकासा
चौदां भुवन के चौधरी मरिहैं
इन्हूं की का आसा
नौहूं मरिहैं दसहूं मरिहैं
मरि हैं सहज अठ्ठासी
तैंतीस कोट देवता मरिहैं
बड़ी काल की बाजी
नाम अनाम अनंत रहत है
दूजा तत्व न होइ
कहत कबीर सुनो भाई साधो
भटक मरो ना कोई



Disclaimer: Its obvious that I don’t own copyright for the poetry of Sant Kabir, the pic and the video clip by Agnee band. All credit goes to the respective copyright owners.

ऊधो, मोहिं ब्रज बिसरत नाहीं (उद्धव् मुझे ब्रज भुलाये नहीं भूलता)

जब कभी किचन का समान घटता है तो यूँ लगता है कि दौड़ कर जाऊँ निशातगंज की मार्केट या इंदिरानगर की बजरंगी की दुकान और सारा समान ले आऊँ… लेकिन ये क्या निशातगंज और इंदिरानगर दिल्ली में थोड़े न हैं वो तो लखनऊ में हैं। लखनऊ में बिताये दिनों की यादें और साक्षात् लखनऊ दिमाग से निकलता ही नहीं है, शायद दिल्ली के किराये के मकान में रहने वाले शख्स के दिमाग में लखनऊ घर बना चुका है। दिल्ली में क्यूँ रह रहा हूँ? और कब तक रहूँगा ये प्रश्न मुझे खाए जाता है… दिल्ली मुझे बेगानी लगती है, दिल्ली में ग्यारह साल बिताने के बाद भी ये कभी अपना शहर नहीं लगा… दिल्ली में रहना और दिल्ली को कोसना अब आदत बन चुकी है। अपनी जड़ों को तलाशने में मैं नाकाम हो रहा हूँ, लोग दिल्ली में क्यूँ बसना चाहते हैं मेरी समझ से बाहर की बात है। मैं अपना शहर किसे कहूँ जहाँ जन्म लिया (कानपुर), जहाँ शैशव अवस्था गुजरी (लोकतक, मणिपुर), जहाँ बचपन कटा (इलाहाबाद), जहाँ जवानी गुजरी (लखनऊ) या फिर जहाँ जवान से अधेड़ होने वाले हैं (दिल्ली)।
कोई दिल्ली में क्यूँ रहना चाहता है? कहीं दूर झारखण्ड, छत्तीसगढ़, कर्णाटक, केरल या अंदमान निकोबार में क्यूँ नहीं… लेह, लद्दाक, मिजोरम, सिक्किम में क्यूँ नहीं बसना चाहता कोई, आखिर क्या देती है दिल्ली… रोज़गार? वो तो यहाँ नाम-मात्र है… यहाँ पढ़े-लिखे लोगों से ज्यादा अंगूठाछाप पैसे कमाते हैं।
लखनऊ में मैंने केवल पाँच साल गुजारे हैं जो जीवन के सबसे ठलुआ दिन थे, उन दिनों ने सपनों को रोज़ टूटते, कुचलते और रौंदते देखा है फिर भी इस शहर से मोहभंग नहीं होता है, ये कोई अध्यात्मिक नगरी नहीं है, देश का चुनिन्दा पर्यटन स्थली भी नहीं है… यहाँ बहने वाली गोमती नदी पूजनीय नहीं है और न पापनाशिनी है लेकिन फिर भी है कुछ इस शहर में जो अन्य कहीं नहीं है।
देश के अट्ठारह राज्य और तीन केन्द्र-शासित प्रदेश को देख चुकने के बाद जितना अपनापन लखनऊ से लगा उतना और किसी शहर से नहीं।
लखनऊ शहर ने कुछ दिया नहीं और दिल्ली ने कुछ बिगाड़ा नहीं फिर भी दिल्ली शहर के प्रति नफ़रत मिटाए नहीं मिट रही है। मेरे लिए लखनऊ ही ब्रज है जैसे ‘स्टॉकहोम सिंड्रोम’ से ग्रस्त व्यक्ति को अपने उत्पीड़क से विशेष लगाव हो जाता है। ऊधो, मोहिं ब्रज बिसरत नाहीं।
(इक्कीस मई २००१ को दिल्ली में पहली बार आने और यहाँ के दलदल में समा जाने पर भाव उद्गार हैं ये।)

Changes are inevitable whether you like them or not



अधूरा सत्य ज्यादा जयते!

बहुत दिनों से टीवी नहीं देखा फिर भी यू-ट्यूब पर ‘सत्यमेव जयते’ देख कर अच्छा लगा… कन्या भ्रूण-हत्या सिर्फ क्लिनिकों में ही नहीं होती है… जो जीव-विज्ञान पढ़ें हुए हैं वो जानते हैं कि साठ के दशक के बाद से जो यौन-क्रांति आई है, गर्भ-निरोधक पिल्स खाना भी जीव हत्या ही है, चाहे नर की हो या मादा की, मित्रजनों की जानकारी के लिए साथ में ही गर्भ-निरोधक पिल्स के अविष्कारक की फोटो है, सौजन्य से रीडर्स डाईजेस्ट
http://www.youtube.com/watch?v=NG3WygJmiVs

सोचने वाली बात ये है कि क्या सिर्फ एबोर्शन कराने वाले ही भ्रूण-हत्या के जिम्मेदार हैं या फिर गर्भ-निरोधक गोलियाँ खाने वाली महिलाएं या फिर उनको ये गोलियाँ खाने को मजबूर करने वाले पुरुष भी गुनाहगार हैं…
सभी धर्म इस बारे में एकजुट हैं कि गर्भ-निरोधक गोलियाँ धर्म और मानवता के खिलाफ हैं, फिर भी जिनकी भावनाएँ ‘सत्यमेव जयते’ या फिर ‘मातृभूमि’ फिल्म देख कर आहत है वो खुद सोचें कि कहीं उन्होंने भी तो किसी अजन्मे का क़त्ल तो नहीं किया… (जिन्होंने जीव-विज्ञान पढ़ा है वो इस बात को बेहतर समझ सकते हैं)
खैर कन्या भ्रूण-हत्या मामलों को निपटाने के लिए फास्टट्रैक कोर्ट की मांग करने वाले आमिर खान के भी कई बच्चे कई महाद्वीपों में हैं, प. रविशंकर के बाद उन्ही का नाम लिया जाता है… पहला पत्थर वही उठाये जो पापी न हो…
सत्य तो जयते लेकिन कहीं अधूरा सत्य भी जयते या न जयते ये तो वक़्त ही बताएगा

.
Picture © Reader’s Digest

 

 

 


Text is not clear because of the bulky book. (Dr. John Rock, co-developer of the pill).
Picture © Reader’s Digest

मैं समय हूँ!

Image

ओड़िशा के रिटायर्ड जज ने अपनी गर्भवती बहू के हाथ-पाँव बंधवा कर महानदी में फेंकवा दिया मरने के लिए। लेकिन बचाने वाला मारने वाले से बड़ा निकला। बहू और उसकी कोख में पल रहे बच्चे को मारने के लिए जज ने साढ़े तीन लाख की सुपारी दी। काश कुत्सित मानसिकता के इस जज ने अजन्मे बच्चे के लिए साढ़े तीन लाख का बैंक में फिक्सड डिपोजिट खोल दिया होता। कुछ वर्ष पहले इलाहाबाद हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस बनर्जी ने अपनी अनाथ भतीजी की संपत्ति हड़पने के लिए भतीजी को मानसिक रोगी साबित करके मानसिक चिकित्सालय पहुंचा दिया था। लोभ-वासनाओं में संलिप्त नेताओं, अफसरों और समाज के सम्मानीय तबके को देखकर यूँ लगता है कि पसीना बहा कर मजदूरी करने वाले, रिक्शा चलने वाले सम्मान के अधिक हकदार हैं।
मैं समय हूँ और कुछ बदला नहीं है, महाभारत का धृतराष्ट्र हर युग में रहा है, हर घर में, हर दफ्तर में। युग बदला, काल बदला, बदली हैं सिर्फ तारीखें, इंसान वही है, और मैं??
मैं समय हूँ!

“Orissa ex-judge, wife and son held for trying to kill pregnant woman”
http://www.indianexpress.com/news/orissa-exjudge-wife-and-son-held-for-trying-to-kill-pregnant-woman/947536/

“हिन्दी एट द रेट ऑफ दिल्ली”


दिल्ली में हिन्दी ज़ुबान का जितना अपमान देखने को मिला उतना कहीं और न देखने को मिला और न सुनने को। यहाँ के लोगों के मुँह से सुनने को मिलता है – ‘कोई नई/नइ’ जो कि ‘कोई बात नहीं’ का विकृत रूप है। काश यहाँ के लोग हिन्दी की थोड़ी सी कद्र करना सीख लेते तो अच्छा होता।

Post Navigation

THE LEON KWASI CHRONICLES

⭐EDUCATE⭐MOTIVATE ⭐END THE HATE⭐LIBERATE ⭐FOR A BETTER FATE⭐

aurakarma

Stories from the Streets

wrongwithlife

The immeasurable terrors of her mind...

50 Shades of me

DARK BLUE

INNER THOUGHTS

INNER THOUGHTS

Something Like a Storybook

from Morgan Bradham

Journey of MsT

"His breath took me in..."

DoubleU = W

WITHIN ARE PIECES OF ME

Indie Hero

Brian Marggraf, Author of Dream Brother: A Novel, Independent publishing advocate, New York City dweller

Juliacastorp's Blog

Studii de dans macabru

Chris Wormald - A Photographer's travel blog.

All images and text copyright Chris Wormald 2010

Chasing Pavements Around the World

"respond to every call that excites your spirit"

TIME

Current & Breaking News | National & World Updates

The CEMS Blog

The official blog of Chennai Event Management Services

Ithihas

Kaleidoscope of Indian civilization

The Indian Express

Latest News, Breaking News Live, Current Headlines, India News Online