
क्या हिन्दुओं के त्यौहार मनाना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक और प्राण के लिए घातक हो सकते हैं? क्या इन्हें जान हथेली पर रखकर मनाया जाता है? हर साल दर्जनों हिन्दू-श्रद्धालु होली के हुडदंग में, दीपावली की अमावस के अन्धकार को भगाने में मर-खपते हैं, ये मरते है दुर्गा-दुर्गति नाशिनी को नदी-समुद्र में डुबोने अर्थात विसर्जन में, ये सबरीमाला और महाशिवरात्रि की भगदड़ में भी मरते हैं, नवरात्रि में भी मरते हैं भगदड़ में, कुम्भ मेले में भी मरते हैं भगदड़ से और मंदिर के प्रसाद से भी मरते है विषाक्त भोजन से। आखिर इन भक्तजनों को अपना धर्म और त्यौहार अपने प्राणों से अधिक प्यारा क्यूँ होता है?

राजस्थान के गंगापुर में कैमरे पर सुसाइड
राजस्थान के गंगापुर के एक परिवार के पाँच सदस्य होलिका दहन की रात इस मुगालते में ज़हर खा कर मर गये कि ईश्वर आ कर बचायेगा जरुर और उस परमात्मा की गतिविधियों को वीडियो कैमरे में रिकॉर्ड कर लिया जायेगा, और अगर मर भी गये तो मोक्ष की गारंटी पक्की! लेकिन ‘कमबख्त ईश्वर’ आया नहीं बचाने, क्यूंकि पहले से ही व्यस्त ईश्वर के पास इन ऊल-जलूल बातों के लिए वक़्त नहीं है, और मैंने कमबख्त इसलिए कहा क्यूंकि जिसके पास ‘वक़्त कम’ होता है वो कमबख्त ही होता है (मेरे स्कूली प्रधानाचार्य के शिक्षानुसार)। और आखिर ‘हिन्दू भगवान’ कोई स्पाइडर-मैन, बैट-मैन, या शक्तिमान तो हैं नहीं जो आप उनको पुकारें तो वो साक्षात् प्रकट हो जायें।
पौराणिक कथाएँ इस बात की गवाह रही हैं कि तपस्वियों ने कठोर श्रम कर के, सैकड़ों-हज़ार बरस तपस्या कर ईश्वर के दर्शन को पाया, कुछ परम-भक्तों को तो ईश्वर ने नर-नारायण रूप में ही दर्शन दे कर अन्तर्धान हो गये। क्या ईश्वर को खोजना अपने पड़ोसी की खैर-ख़बर लेने और अपने भाई का दर्द साँझा करने से ज्यादा आवश्यक है?
ज्ञेयः स नित्यसनन्यासी यो न देवष्टि न काङ्क्षति ।
निर्द्वन्दो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ।।3।। अध्याय पाँच, श्रीमदभगवद गीता
‘हे अर्जुन! जो पुरुष न किसी से द्वेष् करता है और न किसी की आकांक्षा करता है, वह कर्मयोगी सदा सन्यासी ही समझने के योग्य है; क्यूंकि राग-द्वेष् आदि द्वंदों से रहित पुरुष सुखपूर्वक संसारबंधन से मुक्त हो जाता है।’
स्वयं और अन्य पारिवारिक सदस्यों के प्राण हरना, ईश्वर प्राप्ति के लिए भी एक आकांक्षा ही है जिसे पुलिसिया जाँचदल और चिकित्सक भी एक मानसिक विकार की नज़र से देख रहे हैं।
वैसे गीता में कृष्ण कहते हैं कि उन्हें भक्त और अभक्त समान रूप से प्रिय हैं, फिर इतने व्रत-उपवास, आडंबर, मंदिर में माथा पटकना आखिर किस लिए?
समोSहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योSस्ति न प्रियः ।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ।।29।। अध्याय 9
‘मैं सब भूतों में समभाव से व्यापक हूँ, न कोई मेरा अप्रिय है और न प्रिय है; परन्तु जो भक्त मुझको भजते हैं, वे मुझमें हैं और मैं भी उनमें प्रत्यक्ष प्रकट हूँ।’
मेरी तुच्छ बुद्धि के अनुसार अगर आप अपने माता-पिता, गुरु, अतिथि को सम्मान दें, अपने बच्चों को उचित संस्कार दें तो ईश्वर दर्शन भले न दे, लेकिन वो मुस्कुरा जरुर सकता है और फिर इस कलियुग में मनुष्य की आयु ही इतनी छोटी हो गयी है कि सैकड़ों-हज़ारों साल ईश्वर की तपस्या करना असंभव है और अगर वो कुछ-एक साल के लिए हिमालय गया भी तो फिर वहीँ पर ईश्वर को भूल कर फेसबुक और ट्विटर अपडेट करेगा, या फिर अपने मोबाइल पर नेटवर्क खोजता फिरेगा।
पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः
वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च ।।17।। अध्याय 9
‘इस सम्पूर्ण जगत का धाता अर्थात धारण करने वाला एवं कर्मों के फल को देने वाला, पिता, माता, पितामह, जानने योग्य, पवित्र ओंकार तथा ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भी मैं ही हूँ।’
© सुशील कुमार