Sushil Kumar's Blog

straight from my heart and soul

अच्छे दिन

UPA - III छवि साभार: शेखर गुरेरा

UPA – III छवि साभार: शेखर गुरेरा


कडु दवा खवाए के
मोदी करें उपचार
रेल करावा बढ़ गवा
अच्छे दिन अबकी बार
ओ भैया अच्छे दिन इस बार
दरोगा कटहल चोर पकरें
नेता करें बलात्कार
जनता करे हाहाकार
बिजली गई, पानी गया
आँखों से इस बार
अच्छे दिन आ गए
मोदी के इस बार
तेल पियें अडानी का
अंबानी को बनी गैस
सूँघे मोदी सरकार
अच्छे दिन आ गए
मोदी के इस बार
महँगाई जब सताए तो
पियें नमो-टी हर बार

© सुशील कुमार 

Why They Hate Each Other: Behind the Sunni-Shi’ite Divide

Sushil Kumar:

Why Shia-Sunnis hate each other?

Originally posted on TIME:

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It has come to this: the hatred between Iraq’s warring sects is now so toxic, it contaminates even the memory of a shining moment of goodwill. On Aug. 31, 2005, a stampede among Shi’ite pilgrims on a bridge over the Tigris River in Baghdad led to hundreds jumping into the water in panic. Several young men in Adhamiya, the Sunni neighborhood on the eastern bank, dived in to help. One of them, Othman al-Obeidi, 25, rescued six people before his limbs gave out from exhaustion and he himself drowned. Nearly 1,000 pilgrims died that afternoon, but community leaders in the Shi’ite district of Khadamiya, on the western bank, lauded the “martyrdom” of al-Obeidi and the bravery…

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बोलबचन

छवि साभार: http://mysay.in/category/stay-fit/

छवि साभार: http://mysay.in/category/stay-fit/

एक बाबा जी बड़ा दिव्य प्रवचन सुना रहे थे, पंडाल खचाखच भरा हुआ था, हज़ारों की भीड़ थी, भक्तजन बड़ी श्रद्धा से काफ़ी देर से प्रवचन सुन रहे थे। प्रसादम का टाइम होने से पहले ही पिछली कतार के भक्त सरकने लगे। सरकते सरकते सारे भक्त सरक लिए लेकिन बाबा जी प्रवचन निर्बाध गति से सुनाते रहे। जब अंत में दो लोग ही पंडाल में बचे रह गए तो बाबाजी बड़े प्रसन्न होकर बोले – तुम लोग बड़े शुद्ध भक्त हो, धर्म की पताका तुम जैसे भक्तों की वजह से लहराती है, मैं बहुत खुश हूँ कि तुम दोनों ने पूरा प्रवचन सुना।
दोनों भक्त हाथ जोड़कर झेंपते हुए बोले बाबाजी हम टेंट वाले हैं, बड़ी देर से आपका प्रवचन ख़तम होने का इंतज़ार कर रहे थे। तंबू उखाड़ना है!
© सुशील कुमार

असली गाँधी – नकली गाँधी

Imageबहुत से बुद्धूजीवी गाँधी बाबा के सत्य के प्रयोग, उनके ब्रह्मचर्य पर किये गए प्रयोगों से जोड़ कर देखते हैं, लेकिन गाँधी बाबा ने ये प्रयोग दक्षिण अफ्रीका में 22 साल किये, इंग्लैंड में भी किये और भारत में भी अपनी अंतिम सांस तक किये। कुछ लोगों ने गाँधी बाबा के अनशन और सविनय अवज्ञा आंदोलन का चीप संस्करण निकालना चाहा, दांडी-यात्रा में नमक बना कर क़ानून तोड़ने की नक़ल बिजली के तार जोड़ कर की, जनता के बीच जनमत संग्रह कराया लेकिन सत्य के प्रयोगों से मात्र तीन साल में ही उकता कर एक से बढ़कर एक सफ़ेद झूठ बोले, बच्चों की झूठी कसमें खायीं, गाँधी बाबा के लंगोट की तरह मामूली आदमी की तरह मफ़लर लपेटा लेकिन सब व्यर्थ गया, तीन साल के सत्य के प्रयोगों में तीस साल के सत्य के प्रयोगों के तप का बल न था।
गाँधी बाबा ने अपने रसूख़ का बेजा इस्तेमाल नहीं किया, न आज़ाद भारत की सत्ता भोगी और न चंदे के पैसों को अपनी तिज़ोरी में ठूँसा। ग़ैर-बुद्धूजीवी कट्टर हिन्दू गाँधी बाबा को इसलिए कोसते हैं क्यूंकि उन्होंने बंटवारे के बाद मुसलमानों को पाकिस्तान जाने से रोका और हिन्दुओं द्वारा मुसलमानों का जी भर कर क़त्ल-ए-आम करने से रोका और इसके लिए अनशन तक किया। उग्र ब्राह्मण इस बात का गर्व भी करते हैं कि इस गाँधी बाबा को एक ब्राह्मण ने ही वध किया, वध शायद राक्षसों का किया जाता है या फिर पशुओं का।
उधर बाबा रामदेव ने ख़ुद को चुनावी नतीज़े के तीसरे दिन बाद ही अपनी तुलना गाँधी बाबा से की है, गाँधी बाबा एक व्यावसायिक घराने से थे लेकिन ख़ुद कभी धन्धा नहीं किया, वकालत की, जन-आंदोलन चलाया, भारत माता की जय के साथ ही महात्मा गाँधी की जय का स्वतंत्रता सेनानी हुंकार भरते थे।
गाँधी बाबा ने अंग्रेजी हुकूमत से अहिंसात्मक लड़ाई लड़ी, अंग्रेज़ों को कभी कटुवचन नहीं बोले, कोई गाली-गलौज नहीं, कोई ग़िला-शिक़वा नहीं, हमेशा मर्यादा में रहे। 31 साल तक सत्याग्रह आंदोलन चलाया, आंदोलन हिंसक होने पर आंदोलन रद्द भी कर दिया, कोई जल्दबाज़ी नहीं दिखाई, कभी किसी सेना बनाने की बात नहीं की, किताब लिखी, एक-एक पत्रों के ज़वाब रोज़ सुबह चार बजे उठ कर लिखे, तीन समाचारपत्र भी चलाये। दक्षिण अफ्रीका से आने के बाद भारत के गाँव-गाँव भ्रमण किया, देश को जाना-समझा, कतार में खड़े आखिरी आदमी का दर्द समझा, लेकिन अपनी तुलना ईसा मसीह से नहीं की, अपनी गलतियों को स्वीकारा भी, लेकिन अपनी लोकप्रियता को भुनाया नहीं। अकूत धन जमा नहीं किया, द्वीप नहीं ख़रीदे, पाँच-सितारा आश्रम भी नहीं बनाये। अंग्रेजों के भारत छोड़ने का श्रेय भी नहीं लिया।
वकालत करने के बाद गाँधी बाबा ने 57 साल तक सार्वजनिक जीवन जिया। यहाँ 3-4 साल के आंदोलनकारी ख़ुद की बराबरी गाँधी बाबा से करना चाह रहे हैं। गाँधी बाबा ने बँटवारे के बाद के दंगों में न्यूटन को याद भी तो नहीं किया था। यह कैसा कलयुग है कि ख़ून के प्यासे ख़ुद की बराबरी महात्मा गाँधी से कर रहे हैं?
© सुशील कुमार
छवि साभार: https://www.facebook.com/Outlookindia

 

जमदाग्नि की अग्नि

Image

उस औरत का कुछ भी नाम हो सकता है
जैसे रेणुका, सीता या फिर बबिता
और उसका मरदूद आदमी?
उसका भी तो कुछ नाम हो सकता है
जैसे जमदाग्नि, राम या फिर कुछ और…
जिस पतनगामी औरत के पति ने उसे ज़िंदा जलाया
वो कौन था?
जमदाग्नि, राम या फिर कोई और?
उस औरत को किसने मारा?
धर्म ने या अधर्म ने?
या फिर किसी जमदाग्नि, राम या
किसी और पुरुष की ईर्ष्या ने
या फिर कोई और…

© सुशील कुमार

माफ़ी?

भाजपा ने माफ़ी माँगी!
तो क्या फिर कल से बाबरी मस्जिद का पुनर्निर्माण शुरू होगा?
या फिर एक धक्का और दो…
अभी तो मथुरा, काशी भी बाकी है…
क्या मियाँ लोग कल से फिर से आगे से खाने लगेंगे?
और जो गुजरात में न्यूटन को कलंकित किया उसका क्या?
क्या सचमुच राजूनाथ बन गया जेंटलमैन?

© सुशील कुमार

चिदंबरम के नटराज मंदिर में एक मुस्लिम महिला अपने बच्चे के साथ

चिदंबरम के नटराज मंदिर में एक मुस्लिम महिला अपने बच्चे के साथ

Evolution of Vampires

Bhopal Union Carbide memorial, Image source: Wikipedia

Bhopal Union Carbide memorial, Image source: Wikipedia

When there was era of sword,
the cities were plundered,
temples looted,
men were treated as slaves,
women were raped
or made to live as concubines.
When gun powder was discovered,
swords were reduced to blade of grass,
colonies were established,
and sun never set on British Empire.
When Dynamite was discovered
mountains were razed to dust.
When satellites began
roaming in earth’s orbit,
villages and forests
were reduced to mines.
When nuclear bomb was dropped,
the humanity was choked by radiations.
When Auschwitz happened,
humanity was ashamed of being inhuman.
When Bhopal Gas tragedy struck in midnight,
thousands of poor Indians died a silent death,
dreaming the life of comfort and happiness,
when their souls awoke from grave,
they found politicians, Babus, Judges
laughing incessantly.
Few vampires,
were praying secretly for
Tsunamis,
earthquakes,
deluges,
industrial disasters
and wars,
to quench their
thirst for wealth.

© Sushil Kumar

एक पुरानी कहानी

“चु. चि.”
नाम सुना है आपने कभी इसका??
आज आपको ‘चु. चि.’ की कहानी सुनाएंगे…
बहुत समय पहले की बात है जब सन्डे को देश में दिन में कर्फ्यू लगता था… जब रामायण टीवी पर आता था।
जब होली-दिवाली-ईद-बकरीद की तरह से चुनाव का त्यौहार भी आता था। लोक-सभा, राज्य-सभा, विधान-सभा, विधान-परिषद्, नगर-निकाय…. ये सब मैं नहीं जनता था… शायद जो वोट देते थे वे भी नहीं जानते थे। तब मैं बच्चा था और हर वोट डालने वाला भी बच्चा ही था… शेषन के आने से पहले हर मतदाता आखिर बच्चा ही तो था… जिसे चुनाव के पहले झुनझुना थमाया जाता था।
तो मैं बता रहा था चु. चि. की कहानी। कहानी का काल तय करें तो १९८६-१९८७ के आस-पास… तब साल भर दीवारें चु. चि. से लबरेज़ रहती थीं… क्यूँकि चुनाव तो आते-जाते रहते थे टाईप-टाईप के। अब आप ज्यादा सकपकाए नहीं… चु. चि. का मतलब बता दे रहे हैं, शब्द- संक्षेप है चुनाव चिन्ह का बोले तो ‘चु. चि.’…
अब मैं यू. पी. में ज्यादा आना-जाना नहीं रखता लेकिन इतना तो तय है कि दीवारें अब उतनी बदरंग नहीं होती होंगी जितनी पहले होती थीं। इलाहाबाद में अगर विश्वविद्यालय के छात्र-संघ का भी चुनाव हो तो पूरा शहर नारों से पट जाता था।
ख़ैर आप भी क्या फजूल की बातों से बोर हो रहे हो…
मज़े की बात सुनिये… जब मैं छोटा बच्चा था, उम्र आठ-नौ साल तब मैंने भी चुनाव प्रचार किया है, स्कूल से लौट कर हम नारे लगाते थे – महदूद किबरिया ज़िंदाबाद… मुझे लगता था कि ज़िंदाबाद भी शायद इलाहाबाद, ख़ुल्दाबाद, दरियाबाद जैसे किसी इलाके का नाम होगा, ‘चु. चि.’ थी छतरी और पुल्लिंग बोले तो छाता ।
कार में बैठ कर शहर में नारे लगाना तब उच्च स्टेटस सिम्बल माना जाता था… कार जो नहीं थी दूर-दूर तक किसी के पास… कारों का काफिला निकलता और महदूद किबरिया जिंदाबाद, जो हमसे टकराएगा चूर-चूर हो जायेगा!!!
हम स्वयं इतने कोमल थे तो कोई हमसे टकराकर चकनाचूर कैसे हो सकता है ये बात समझ से परे थी।
मतदान का दिन आया और फिर चुनावी नतीजे का, हमारी बाल-वृन्द टोली की मेहनत पर पानी फिर गया था… महदूद किबरिया कई महीने गायब रहे, बोले तो लापता…. चुनाव हार गए थे नगर निगम का, जमानत ज़ब्त हो गई थी… सात भोट/वोट मिले थे… परिवार वालों ने भी वोट नहीं दिया था… जब नारे लगाने वालों को पूड़ी-सब्जी-लड्डू नहीं खिलाये थे तो ऐसे लीचड़ नेता को कोई क्यूँ भोट देता?
कभी वो सख्स मिला तो मैं भी अपना मेहनताना माँगूंगा, दस दिन जो गला फाड़-फाड़ कर सत्यानाश कराया था अपना।
याद तो रहेगा न चु. चि. – छतरी!
© सुशील कुमार

छवि साभार: India Today

छवि साभार: India Today

Dashavataram – zip zap zoom!

Handiworks of Indian artists are world famous, just look how an artist is giving final shape to Lord Vishnu’s Dashavatarm (10 incarnations) on wood and applying number of paints. The place is Pragati Maidan’s World Trade Fair, New Delhi.
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God made man and man made God!

God made man and man made God!


And now the most famous Dashavataram of Vishnu
completed wooden statue of Krishna

completed wooden statue of Krishna

Terrorist

Supreme Court of India

Supreme Court of India

Terrorist are not those
who hide their face
from the crowd
to blow up market
temple, mosque, church.

Terrorist are not those
who sabotage railway tracks
who kills children in school
with lethal gas.

Terrorist are not those
who kill innocents
in the name of
Jehad
Crusade
Dharm-Yuddha.

Terrorist are not those
who have affiliations to
Saffron and Green identities.

Terrorist are those
who touch inappropriately
a young gal
in school,
in college lab,
in school cab.

Terrorist are those
who demean
young women
as in casting couch.

Terrorist are those
Supreme Court judges
who hide their face
from the crowd
to blow up Justice,
who trample young interns
to extinguish
their fire of groin.

Terrorist are not Green
Terrorist are not Saffron
they come in the package
of decency.

And a true terrorist
demands more and more respect
for being a wicked soul.

My Lordship!
You are one of those terrorists.
Be a man,
and don’t hide your face from the crowd.

© Sushil Kumar

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