Sushil Kumar's Blog

straight from my heart and soul

Friends forever!

We all love fairy tales and particularly tales of love and friendship. But as we grow older we find that our all enemies were once our best pals and secret keepers. As life moves on, we learn that best friends are opportunists who never show their face till next concern.
Anyway, enjoy this hippopotamus ride!

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Money matters!

Snail with Rs 2 coin

Snail with Rs 2 coin

शहर में साँड़

यह मानकर कि वह तो नंदी है शिव का वाहन
शहर में छोड़ दिया गया था वह
सद्धर्म का पुंडरीक समझकर पूजते थे उसे लोग
वह स्वच्छंद विहरता रहता था और अकेला अपनी ताक़त से
रोक दिया करता था बाज़ार में सारा यातायात
सारा व्यापार और आवाजाही लोगों की ।

उसके डकारने का गूँजता स्वर
शंखनाद की तरह उठता था जब
तो लोगों को लगता था
कि कितनी तेज़ है धर्म की गति और कितना प्रबल है प्रताप धर्म का
वह बाज़ार की गलियों को आतंकित कर देता था अपनी एक हुंकार से
और खिलवाड़ में लूट लेता था हाट में गुड़ की पिंडियाँ
लीला थी वह उसकी

उसकी वह थूथन धँस पड़ती थी सब्ज़ीमंडी में
और अधचबाए पदार्थ नीचे गिराती बढ़ जाती थी आगे
अब वह सूजी है किरानों वालों की लाठियों की मार से
अब वह झुकती चली गई नीचे और नीचे अपमान खा-खाकर
और भर गई हैं झुर्रियों से ।

कितनी-कितनी गायें कामार्त्त होकर
दौड़ती चली आती थीं उसके पास
सटकर उसकी देह से तृप्त होती थी प्रजनन की उनकी इच्छाएँ
कितनी चिकनी मांसल थी उसकी देह उस समय
कीचड़ में लिथड़ी उसी देह पर अब बच्चे फेंकते हैं ढेले
और रेंगते हैं कीड़े

शिवरात्रि पर श्रद्धा भक्ति से समन्वित लोग आदर में भरकर करते थे उसका पूजन
संभ्रांत महिलाएँ आकर उसके सींगों के बीच प्रशस्त ललाट कर लगाती थीं तिलक
अब वह नहीं जानता कब कहाँ हो रहा है शिवरात्रि का उत्सव
वह जहाँ-तहाँ भटकता है
खिन्न विषन्न वह बाज़ार में घूमता है स्कूटरों, मोटरों और कारों के बीच ।

उतर चुका है उसका उन्माद
बिसरा दी जा चुकीं है उसके त्रास की कथाएँ
छिन्न-भिन्न हो चुके जाल
उन दन्तकथाओं और मिथकों के
उसके इर्दगिर्द जो बुने गए थे ।
निःशेष है उसका आतंक,
शिथिल उसकी गति,
गिर चुकी उसकी दंतावली
एक पैर उसका टूट चुका लाठियों की मार से
दूसरा कुचला गया मोटर से दुर्घटना में
एक पाँव पर खड़े धर्म की तरह वह घिसटता है दयनीय
अपनी सारी माया के सिमट चुकने पर सकपकाया ।

© श्री राधावल्लभ त्रिपाठी एवं साभार साहित्य अकादेमी

Bull

शहर में गायें

वृन्दावन की कुञ्ज गली में कचरा खाती गाय

वृन्दावन की कुञ्ज गली में कचरा खाती गाय

वे दुह ली जाती हैं भोर होते-होते
फिर ग्वाले उन्हें छोड़ देते हैं
वे भटकती हैं शहर में
भूखी और खाद्य अखाद्य न जानती हुईं
जूठन खोजने के लिए
जहाँ-तहाँ सँकरे और सामानों से अटे-पटे
बाज़ार में मुँह मारती हुईं

वे बेखटके घुस जाती हैं टूट चुके किवाड़ों वाले सार्वजनिक शौचालय में
थूथन आगे कर चबड़-चबड़ कर खा ही लेती हैं मल
सड़क पर आते-जाते वाहनों के बीच समूह में
व्यूह के भीतर से जैसे निकलती हैं वे
निःशंक विचरती हैं
डरती नहीं हैं अब वे वाहनों से
और न बिदकती हैं
हार्न के कर्कश कर्णविदारक रव से।

उद्यान में खिलते फूलों से भरे पौधों के बीच
या प्रशस्त राजमार्ग पर वे अचानक कर देती हैं गोबर के बड़े-बड़े पोथे
फिर अचानक ही दौड़ पड़ती हैं हंबा-हंबा के गूँजते स्वर के साथ
हाथ में डंडे लिए लड़के उन्हें पुकारते हैं जब।

आज के प्रश्नों के आगे दहल गई पहले की आस्थाओं की तरह
वे पीटी जाती हैं बाज़ारों में लाठियों के प्रहार से लगातार या पत्थरों की मार से
और कभी-कभी पूज भी ली जाती हैं कहीं-कहीं बची रह गई श्रद्धा की तरह
अपमान और पूजा के बीच छीजती हैं गायें

कोई गाय सागर के किनारे मरुस्थल में खड़ी मिल सकती है
क्या वह ध्यान कर रही होती है तरणितनूजातट की तमाल पंक्ति का
गोपियों के गीत या वंशी के मधुर रव जहाँ से फूटते रहे हों
और ग्वाला बजाता हो बाँसुरी

कोई गाय अकेली छूट गई बाज़ार में भटकती है
वह चुपचाप सह लेती है लोढ़ों की मार
भरी दुपहर वह डामर की तपती सड़क पर चल रही होती है
और जहाँ-तहाँ मार खाती है लाठियों की

राजनीति के चक्रव्यूह में फँसी
कभी इस दल के दलदल में कभी किसी कमंडल के जल में
वह चाहती है उसे केवल
एक जानवर होने का
पूरा हक़ तो मिले।

उसके लिए बिला गए हैं अब छायादार पेड़
जिनके नीचे हरी घास उगी हो
पास में पानी के डाबरे और साफ़ हवा सहलाती उसका तन
ग्वालों का अपने हाथ से खुजलाना और डाँस निकालना उनकी देह से
भक्ति से की गई वह सारी सेवा अब नहीं है उसके लिए।
गोबर से लिपे बहू के हाथ से झाड़ू लगे घर के आगे
रसोई में उसके लिए अलग निकालकर रख दी गई पहली रोटी
बछड़े के जीभ से चाटना और थनों से उसके झरता दूध
यह सब उसकी स्मृति में है
यह जो गाय
ले जाई जा रही है बूचड़खानों में।

अब गोधूलि नहीं होती
न गोष्ठी सजती है, न गोपायन
समाप्त है गवेषणा। धुँधला गई है गोरोचना की छवि।
अब नहीं होता है गोत्रस्खलन। गोजागर हो गया है मूर्च्छित।
सब कुछ गोपद में निमग्न है या गोलोक में कहीं स्थित।

छोटी होती जा रही है धरती
घास भी कहाँ मिल पाती है सुविधा से
न पानी ही मिल पाता है
चारों ओर से उठ खड़ा हुआ है यह जो भवनों का जंगल
उसके बीच त्रस्त गायें
क्या सीता की तरह भूतल में समा जाएँ?

© श्री राधावल्लभ त्रिपाठी एवं साभार साहित्य अकादेमी

प्रश्न

प. बंगाल के नदिया जिले के एक छोटे से गाँव में गुरुदेव की शांत-सौम्य प्रतिमा

प. बंगाल के नदिया जिले के एक छोटे से गाँव में गुरुदेव की शांत-सौम्य प्रतिमा

भगवान तुमने युग-युग में बार-बार इस दयाहीन संसार में
अपने दूत भेजे हैं।
वे कह गये हैं – क्षमा करो,
कह गये हैं – प्रेम करो, अंतर से विद्वेष का विष
नष्ट कर दो।
वरणीय हैं वे, स्मरणीय हैं वे,
तो भी आज दुर्दिन के समय उन्हें निरर्थक
नमस्कार के साथ बाहर के द्वार से ही
लौट रहा हूँ।
मैंने देखा है – गोपन हिंसा ने
कपट-रात्रि की छाया में निस्सहाय को
चोट पहुँचायी है।
मैंने देखा है – प्रतिकारविहीन ज़बर्दस्त के
अत्याचार से, विचार की वाणी चुपचाप
सिसक रही है,
मैंने देखा है – तरुण बालक उन्मत्त होकर
दौड़ पड़ा है,
बेकार ही पत्थर पर सर पटक-पटककर मर गया है;
कैसी घोर यंत्रणा है उसकी?
अमावस की कारा ने मेरे संसार को
दुःस्वप्नों के निचे लुप्त कर दिया है,
इसीलिए तो आँसू-भरी आँखों से तुमसे पूछ रहा हूँ –
जो लोग तुम्हारी हवा को विषाक्त बना रहे हैं,
उन्हें क्या तुमने क्षमा कर दिया है?
उन्हें क्या तुमने प्यार किया है?

(गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कविता। ३१ दिसम्बर, १९३२ को लिखी गयी और हज़ारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा अनुदित।)

Question

God, again and again through the ages you have sent messengers
To this pitiless world
They have said, ‘Forgive everyone’, they have said, ‘Love one another –
Rid your hearts of evil.’
They are revered and remembered, yet still in these dark days
We turn them away with hollow greetings, from outside the doors of our houses.
And meanwhile I see secretive hatred murdering the helpless
Under cover of night;
And Justice weeping silently and furtively at power misused,
No hope of redress.
I see young men working themselves into a frenzy,
In agony dashing their heads against stone to no avail.
My voice is choked today; I have no music in my flute:
Black moonless night
Has imprisoned my world, plunged it into nightmare. And this is why,
With tears in my eyes, I ask:
Those who have poisoned your air, those who have extinguished your light,
Can it be that you have forgiven them?
Can it be that you love them?

(Translated by Gavin Duley)

 

The Fortune Teller

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This post is really late, almost five months delayed. It was my promise to this astrologer from my hometown Allahabad that I would like to write few words on him. We have seen fortune tellers erupt every morning in news channels predicting the future of persons according to their zodiac signs and date & time of their birth. Only few are master of this profession, rest make this as their bread and butter because of their oratory skills. It is impossible to say for someone that he has never seen a fortune teller. And the greatest dilemma is that everyone wants to know their future but no one wants to mend the present and learn a lesson from past. Thankfully, I have met few astrologers who have said many things about my ‘past’ precisely but not the ‘future’! Let the future be uncertain or else what would be the charm in living a life which is predictable.
There were few astrologers like Varahamihir and Cheiro whose work and predictions have surprised the severe critics and Astrology is still debated in schools whether it is a science or not?
There are many prophecies in ‘Bhavishya Purana’ and Nostradamus’s book which still have to see the light of day and we know that many of those prophecies have proven accurate.
There are few who like to give undue credit to ‘destiny’ for other’s good fortune and their own bad times and there are many who think that we are just puppets in the hands of almighty and everything is predetermined since our birth. Most of us mutter that we didn’t get what our hard work deserved as compared to our friends and rivals and owe a lots to ‘destiny’ and God’s wish. Yet, we find beautiful words of wisdom in Srimad Bhagvad Gita.
“कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः ।
स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ।। श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय ४, श्लोक १८
He who finds inaction in action, and action in inaction, he is the wise one among men; he is engaged in Yoga and is a performer of all actions! Srimad Bhagvad Gita, Chapter 4, Verse 18.”
By the way you can find such fortune teller in a marvellous story by R. K. Narayan – An Astrologer’s Day.
© Sushil Kumar

Kolkata – the city of remarkable sang-froid!

Waiting for bus with no sign of restlessness

Waiting for bus with no sign of restlessness

मरा चमड़ा और जीवित धर्म

कुम्भ मेला के साधू

कुम्भ मेले में आसन जमाये साधू

मैंने इस साल प्रण किया था कि नवरात्र में देवी एवं देवी के भक्तों के बारे में कुछ अनाप-शनाप नहीं कहूँगा, लेकिन बचपन की एक जिज्ञाषा शांत हो गयी है। आखिर छोटे-छोटे शहरों के बड़े-बड़े देवी के मंदिरों और बड़े शहरों के छोटे-बड़े मंदिरों में भक्तों के चमड़े के वॉलेट, लेडीज पर्स और चमड़े की बेल्ट पर आपत्ति क्यूँ होती है, खासतौर पर साल के दो नवरात्रों में। इस चमड़ा-द्वेष को दिल्ली के अक्षरधाम मंदिर में भी देखा जा सकता है और देवियों के सिद्धपीठ की भला बात ही क्या करना।
खैर, श्रीमदभगवदगीता के अध्याय छह, श्लोक ११- १२ में लिखा है -
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः ।
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ।।
तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः ।
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये ।।

शुद्ध भूमि में, जिसके उपर क्रमशः कुशा, मृगछाला और वस्त्र बिछे हैं, जो न बहुत ऊँचा है और न बहुत नीचा, ऐसे अपने आसन को स्थिर स्थापन करके – ।।११।।
उस आसन पर बैठकर चित्त और इन्द्रियों की क्रियाओं को वश में रखते हुए मन को एकाग्र करके अंतःकरण की शुद्धि के लिए योग का अभ्यास करें – ।।१२।।
अब प्रश्न ये उठता है कि मरे हिरण की मृगछाला कहाँ से उपलब्ध होगी और क्या आज का नवीन-सनातन उग्र हिन्दू धर्म मरी मृगछाला पर बैठ कर ध्यान या तप अथवा जप करना पसंद करेगा?
वैष्णव-जन तो इस तप-शैली को शैव-समुदाय का बताएँगे लेकिन ये वचन तो साक्षात कृष्ण अर्जुन को गीता में बोल रहे हैं।
लेकिन अभी तक मुझे मेनका गाँधी की ओर से इन दो श्लोकों पर किसी आपत्ति के बारे में पता नहीं चला है। आखिर किस टाइप के हिरण की बात की जा रही है – ‘द वाइल्ड लाइफ (प्रोटेक्शन) एक्ट, 1972′ के शेड्यूल 1, पार्ट 1 में कई तरह के हिरणों का वर्णन है, जिनका शिकार अथवा आखेट करना वर्जित है, और आप तो जानते ही हैं कि चौदह साल से सलमान एंड कंपनी कैसे कोर्ट का चक्कर लगा रहे हैं, कुलमिलाकर हिरण का मसला तो अब ग़ैरकानूनी हो चुका है। लेकिन क्या ये सच बात नहीं है कि गीता में आसन जमाने का जो ढ़ंग बताया गया है उसमें मृगछाला की बात भी है, फिर साल के नौ और नौ – अट्ठारह दिन और कुछ कट्टर हिन्दू मंदिरों में साल भर मरे चमड़े से इतना नाक-भौं क्यूँ सिकोड़ा जाता है? आपके पास उत्तर अथवा किसी प्रकार की जिज्ञाषायें हों तो ज़रूर बताएं। अगली नवरात्रि में अभी काफी दिन शेष हैं।
© सुशील कुमार

The Saint by Kahlil Gibran

Kahlil Gibran is my favourite storyteller, with lesser words and great social message, deeply embedded in the story, his stories always has surprising ends. It was another master storyteller Oscar Wilde who said “every saint has a past and every sinner has a future.” But this story ‘The Saint’ is one step ahead to Oscar Wilde’s concept of sinners. It says if your harmless lie may comfort a restless soul then let it be happen.

THE SAINT
In my youth I once visited a saint in his silent grove beyond the hills; and as we were conversing upon the nature of virtue a brigand came limping wearily up the ridge. When he reached the grove he knelt down before the saint and said, “O saint, I would be comforted! My sins are heavy upon me.”
And the saint replied, “My sins, too, are heavy upon me.”
And the brigand said, “But I am a thief and a plunderer.”
And the saint replied, “I too am a thief and a plunderer.”
And the brigand said, “But I am a murderer, and the blood of many men cries in my ears.”
And the saint replied, “I am a murderer, and in my ears cries the blood of many men.”
And the brigand said, “I have committed countless crimes.”
And the saint replied, “I too have committed crimes without number.”
Then the brigand stood up and gazed at the saint, and there was a strange look in his eyes. And when he left us he went skipping down the hill.
And I turned to the saint and said, “Wherefore did you accuse yourself of uncommitted crimes? See you not this man went away no longer believing in you?”
And the saint answered, “It is true he no longer believes in me. But he went away much comforted.”
At that moment we heard the brigand singing in the distance, and the echo of his song filled the valley with gladness.

Buddha with Angulimala

Buddha with Angulimala


Image credit: www.gandharan-archives.blogspot.com

हे भगवान!

Oh My God

क्या हिन्दुओं के त्यौहार मनाना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक और प्राण के लिए घातक हो सकते हैं? क्या इन्हें जान हथेली पर रखकर मनाया जाता है? हर साल दर्जनों हिन्दू-श्रद्धालु होली के हुडदंग में, दीपावली की अमावस के अन्धकार को भगाने में मर-खपते हैं, ये मरते है दुर्गा-दुर्गति नाशिनी को नदी-समुद्र में डुबोने अर्थात विसर्जन में, ये सबरीमाला और महाशिवरात्रि की भगदड़ में भी मरते हैं, नवरात्रि में भी मरते हैं भगदड़ में, कुम्भ मेले में भी मरते हैं भगदड़ से और मंदिर के प्रसाद से भी मरते है विषाक्त भोजन से। आखिर इन भक्तजनों को अपना धर्म और त्यौहार अपने प्राणों से अधिक प्यारा क्यूँ होता है?

जोधपुर में कैमरे पर सुसाइड

राजस्थान के गंगापुर में कैमरे पर सुसाइड

राजस्थान के गंगापुर के एक परिवार के पाँच सदस्य होलिका दहन की रात इस मुगालते में ज़हर खा कर मर गये कि ईश्वर आ कर बचायेगा जरुर और उस परमात्मा की गतिविधियों को वीडियो कैमरे में रिकॉर्ड कर लिया जायेगा, और अगर मर भी गये तो मोक्ष की गारंटी पक्की! लेकिन ‘कमबख्त ईश्वर’ आया नहीं बचाने, क्यूंकि पहले से ही व्यस्त ईश्वर के पास इन ऊल-जलूल बातों के लिए वक़्त नहीं है, और मैंने कमबख्त इसलिए कहा क्यूंकि जिसके पास ‘वक़्त कम’ होता है वो कमबख्त ही होता है (मेरे स्कूली प्रधानाचार्य के शिक्षानुसार)। और आखिर ‘हिन्दू भगवान’ कोई स्पाइडर-मैन, बैट-मैन, या शक्तिमान तो हैं नहीं जो आप उनको पुकारें तो वो साक्षात् प्रकट हो जायें।

पौराणिक कथाएँ इस बात की गवाह रही हैं कि तपस्वियों ने कठोर श्रम कर के, सैकड़ों-हज़ार बरस तपस्या कर ईश्वर के दर्शन को पाया, कुछ परम-भक्तों को तो ईश्वर ने नर-नारायण रूप में ही दर्शन दे कर अन्तर्धान हो गये। क्या ईश्वर को खोजना अपने पड़ोसी की खैर-ख़बर लेने और अपने भाई का दर्द साँझा करने से ज्यादा आवश्यक है?

ज्ञेयः स नित्यसनन्यासी यो न देवष्टि न काङ्क्षति ।
निर्द्वन्दो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ।।3।। अध्याय पाँच, श्रीमदभगवद गीता

‘हे अर्जुन! जो पुरुष न किसी से द्वेष् करता है और न किसी की आकांक्षा करता है, वह कर्मयोगी सदा सन्यासी ही समझने के योग्य है; क्यूंकि राग-द्वेष् आदि द्वंदों से रहित पुरुष सुखपूर्वक संसारबंधन से मुक्त हो जाता है।’

स्वयं और अन्य पारिवारिक सदस्यों के प्राण हरना, ईश्वर प्राप्ति के लिए भी एक आकांक्षा ही है जिसे पुलिसिया जाँचदल और चिकित्सक भी एक मानसिक विकार की नज़र से देख रहे हैं।

वैसे गीता में कृष्ण कहते हैं कि उन्हें भक्त और अभक्त समान रूप से प्रिय हैं, फिर इतने व्रत-उपवास, आडंबर, मंदिर में माथा पटकना आखिर किस लिए?

समोSहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योSस्ति न प्रियः ।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ।।29।। अध्याय 9

‘मैं सब भूतों में समभाव से व्यापक हूँ, न कोई मेरा अप्रिय है और न प्रिय है; परन्तु जो भक्त मुझको भजते हैं, वे मुझमें हैं और मैं भी उनमें प्रत्यक्ष प्रकट हूँ।’

मेरी तुच्छ बुद्धि के अनुसार अगर आप अपने माता-पिता, गुरु, अतिथि को सम्मान दें, अपने बच्चों को उचित संस्कार दें तो ईश्वर दर्शन भले न दे, लेकिन वो मुस्कुरा जरुर सकता है और फिर इस कलियुग में मनुष्य की आयु ही इतनी छोटी हो गयी है कि सैकड़ों-हज़ारों साल ईश्वर की तपस्या करना असंभव है और अगर वो कुछ-एक साल के लिए हिमालय गया भी तो फिर वहीँ पर ईश्वर को भूल कर फेसबुक और ट्विटर अपडेट करेगा, या फिर अपने मोबाइल पर नेटवर्क खोजता फिरेगा।

पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः
वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च ।।17।। अध्याय 9

‘इस सम्पूर्ण जगत का धाता अर्थात धारण करने वाला एवं कर्मों के फल को देने वाला, पिता, माता, पितामह, जानने योग्य, पवित्र ओंकार तथा ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भी मैं ही हूँ।’

© सुशील कुमार

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